ब्रेकिंग
हरदा बिग ब्रेकिंग : दुःखद सड़क दुर्घटना में पति-पत्नी सहित दो मासूम बच्चों की मौत, चाचा गंभीर घायल, क... तूफानी रफ्तार : 25 फीट दूरी तक उछलकर नाले में पलटी कार, एयर बैग खुलने से बची युवक की जान सड़क बनाने खोदी मुरम, गड्ढे में भरा वर्षा का पानी, तीन बच्चियों की डूबने से मौत BREAKING NEWS : ट्रक और फोर व्हीलर वाहन भीषण टक्कर, हरदा के एक ही परिवार के 4 लोगों की मौत, 1 गंभीर अशोक गहलोत ने बताई बागी विधायकों की नाराजगी की वजह, पायलट गुट पर साधा निशाना उजड़ गए 3 परिवार, बच्चों के शव देख कांपी रूह, अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ राजनीतिक सरंक्षण में हो रहा अवैध उत्खनन,कार्यवाही में अवैध खदान से 11 ट्रक किए जब्त अवैध उत्खनन पर कार्यवाही में 746 एफआईआर,456 किए गिरफ्तार ,साढे़ 11 करोड़ जुर्माना वसूला,कार्यवाही से ... हरदा -  8 दिसंबर 1933 में हरदा आये थे गांधीजी । उन्हें 1633 रुपये 15 आने भेंट किये हरदा वासियो ने ! धार्मिक नगरी सिराली: दाना बाबा नवदुर्गा उत्सव समिति का विराट कवि सम्मेलन आज

मध्य प्रदेश में पुत्रमोह ले डूबा भाजपा को

Header Top

जालंधर: मध्य प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शपथ ग्रहण कर ली है। वहीं दूसरी तरफ विधानसभा चुनावों में 108 सीटें हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी के हार के कारणों को लेकर भी चर्चा छिड़ गई है। चर्चा यह है कि इस हार के लिए पुत्रमोह से ग्रसित भाजपा के कद्दावर नेताओं का योगदान भी कुछ कम नहीं है। ये नेता अपने पुत्रों को जितवाने के चक्कर में इंदौर और उज्जैन संभाग की सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों की जीत में उनकी मदद ही नहीं कर पाए। यही नहीं दोनों संभागों में भाजपा के जो बागी खड़े थे उनको भी चुनाव मैदान से नहीं हटा पाए। साल 2013 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को इंदौर और उज्जैन संभाग से 66 में से 57 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार उसे 35 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। दूसरी तरफ कांग्रेस को पिछले चुनाव में इस संभाग से 9 सीटें मिली थीं, जबकि इस बार 28 सीटों पर सफलता के साथ इन दोनों संभाग में जीते निर्दलीय भी उसके साथ हैं। नतीजा यह हुआ कि भाजपा सरकार बनाने से वंचित रह गई। भाजपा के आम कार्यकत्र्ता को पार्टी के बेदखल होने से ज्यादा दुख इस बात का है कि शिवराज अब कॉमनमैन हो गए हैं।

जिसने मालवा-निमाड़ को रिझाया
उसने सत्ता सिंहासन पाया 

पिछले चुनाव विश्लेषण बताते हैं कि जिसने भी मालवा-निमाड़ को रिझाया उसी ने सत्ता सिंहासन पाया। भाजपा के लिए इस गढ़ को फतह कर पाना मुश्किल भी नहीं था लेकिन जिन्हें यह दायित्व सौंपा मालवा-निमाड़ के वे प्रभारी पहले अपने पुत्रों को टिकट दिलाने और फिर उन्हें जिताने की मशक्कत में लग गए। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को अमित शाह ने पश्चिम बंगाल का दायित्व सौंप रखा है लेकिन मध्य प्रदेश चुनाव के चलते उन्हें मालवा-निमाड़ की 66 सीटों पर अधिकाधिक सीटें जीतने के काम पर लगा रखा था। चुनाव में जीत के लिए हर तरह की मैनेजमैंट में माहिर विजयवर्गीय भले ही अपने पुत्र आकाश के विधानसभा क्षेत्र में एक बार भी नहीं गए लेकिन वह आकाश की जीत के लिए जरूरी हर तरह की मैनेजमैंट में लगे रहे। इसका असर यह हुआ कि दोनों संभागों में अधिकाधिक सीटों पर सफलता की धुआंधार उपलब्धि उनके खाते में दर्ज नहीं हो पाई।

15 हजार से न सही 5 हजार से ही सही 
विजयवर्गीय तो अपने बेटे को जिता लाए, अमित शाह के सामने वह फिर भी तन के खड़े रह सकते हैं लेकिन एस.सी./एस.टी. के कद्दावर नेता की हैसियत से मोदी की बगल में बैठने वाले केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत के बेटे जितेंद्र की आलोट में हुई शर्मनाक हार से उनका सारा आभा मंडल ही स्याह हो गया। जिस बलाई समाज के वह सर्वमान्य नेता माने जाते हैं उस समाज के सर्वाधिक वोट भी विधायक मनोज चावला को मिले हैं। नवनिर्वाचित विधायक मनोज के पिता रतलाम कलैक्ट्रेट में चपरासी हैं। 35 साल के मनोज ग्रैजुएट हैं। चुनाव मैदान में उनके सामने कोई मामूली प्रत्याशी नहीं था। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत के बेटे जितेंद्र के चुनाव प्रचार में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसी कद्दावर शख्सियतों की जनसभाएं हुईं लेकिन यह सीट निकालने में भाजपा सफल नहीं हो सकी।

Shri

बेटे की खातिर टिकट के लिए अड़े रहे गहलोत
भाजपा जिलाध्यक्ष से लेकर आर.एस.एस. के सर्वे और प्रशासन की खुफिया रिपोर्ट में भी जितेंद्र गहलोत की अपेक्षा किसी अन्य को टिकट देने पर सीट निकलने की संभावना बताई गई थी लेकिन पिछली बार की तरह इस बार भी शिवराज पर दबाव बनाने के साथ ही थावरचंद गहलोत पार्टी आलाकमान से लड़-झगड़कर बेटे का टिकट ले आए। पिछले चुनाव में भी मनोहर ऊंटवाल का नाम घोषित हो गया था। उन्होंने कार्यालय का उद्घाटन भी कर दिया था लेकिन बेटे जितेंद्र को यहीं से टिकट देने पर थावरचंद के अड़ जाने के कारण ऊंटवाल का क्षेत्र बदलना पड़ा था। इस बार एट्रोसिटी एक्ट के विरोध का असर उज्जैन संभाग में तो था ही आलोट में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और गहलोत जब नवोदय विद्यालय के भूमि पूजन समारोह में आए थे तब एक्ट के विरोध में आलोट स्वेच्छा से पूर्णत: बंद रहा था। खुद उनके समाज के ही लोगों की लंबे समय से नाराजगी इस बात को लेकर है कि वह सवर्ण समाज के प्रति जितनी सहृदयता दिखाते हैं उतना समाज के प्रति नहीं। विरोध में बहती ऐसी हवा के बाद भी बेटे को आलोट से टिकट दिलाना उनके राजनीतिक जीवन की बड़ी भूल साबित हुई। स्थानीय भाजपा नेतृत्व मानता है कि जितेंद्र को घट्टिया से तथा ऊंटवाल को यहां से टिकट दिया होता तो दोनों सीटें निकल जातीं। गहलोत पर अपने बेटे को नहीं जितवाने का ठप्पा ही नहीं लगा है इंदौर-उज्जैन संभाग की एस.सी./एस.टी. बहुल सीटों पर पार्टी को मिली हार भी उनकी नाकामियों में शामिल हुई है।

गौरीशंकर शेजवार भी नहीं छोड़ पाए पुत्रमोह
कुछ इसी तरह ही शिवराज के मंत्री गौरीशंकर शेजवार ने भी पार्टी को नुक्सान पहुंचाया। जिद करके अपने बेटे मुदित को टिकट दिलवाया लेकिन उसे जितवा तो नहीं पाए बल्कि आसपास की अन्य सीटों पर भी भाजपा के खिलाफ वातावरण बनने से पार्टी नुक्सान में रही।

‘गुड्डू’ वाला गणित फेल
पुत्रमोह में उलझे तीसरे नेता पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू का हाल तो और भी बुरा हुआ। ऐन चुनाव के चलते वह पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा को उम्मीद थी कि विजयवर्गीय और गहलोत के संयुक्त प्रयासों से भगवा हुए गुड्डू के कारण इस वर्ग के वोटों की फसल काटना आसान हो जाएगा लेकिन गुड्डू भी अपने पुत्र अजीत को घट्टिया से नहीं जितवा सके। उज्जैन जिले में तराना, घट्टिया और आलोट सीटें भाजपा हारी है तो इन तीनों का यह पुत्रमोह भी बड़ा कारण है। अब, जबकि गुड्डू अपने बेटे तक को नहीं जितवा सके तो भाजपा का एक खेमा ङ्क्षचतन कर रहा है कि उन्हें पार्टी में शामिल करने का निर्णय जल्दबाजी में तो नहीं लिया गया। दूसरी तरफ कांग्रेस के लगभग सभी गुट खुश हैं कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी प्रेमचंद गुड्डू ने हवा का रुख पहचानने में गलती कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। गुड्डू के कांग्रेस छोडऩे की स्थितियां भी उज्जैन में सिंधिया की सभा के दौरान मंच पर भीड़ हटाने को लेकर बनी थीं जब सिंधिया ने किसी को बास्टर्ड कह दिया था। विजयवर्गीय, गहलोत ने इस निर्णय के लिए पार्टी को राजी करते वक्त कारण तो यह गिनाए थे कि उज्जैन के अजा-जजा वोट बैंक का फायदा मिलेगा, जबकि असली मकसद आलोट सीट से गुड्डू की तैयारियों पर पानी फेर कर अपने बेटे जितेंद्र के लिए यह सीट सुरक्षित करना था। गुड्डू के पुत्र की घट्टिया में पैराशूट लैंडिंग भी इन्हीं दोनों नेताओं के कारण हुई।

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Don`t copy text!