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बिहार: विपक्षी गठबंधन में चेहरे ज्यादा, मजबूती कम!

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जालंधर: बिहार में भाजपा को टक्कर देने के लिए एन.डी.ए. के सहयोगी रहे राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन का हिस्सा बने हैं।  इनके साथ पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हम, सी.पी.आई., लोकतान्त्रिक जनता दल भी हैं।  हालांकि सभी पार्टियों में सीटों की संख्या को लेकर समझौता नहीं हुआ है लेकिन इन पार्टियों ने भाजपा के खिलाफ  मोर्चा खोल दिया है। इनके सामने बिहार का सबसे सफल भारतीय जनता पार्टी और जद (यू) का गठबंधन होगा और इस गठबंधन के साथ राम विलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी भी है।–

बिहार के चुनावी इतिहास को खंगाला जाए तो भाजपा और जद (यू) के गठबंधन के बाद से ही लालू यादव की पार्टी बिहार में कमजोर हुई है और जद (यू) के भाजपा से अलग होने के बाद ही उसे ताकत मिली। अगले चुनाव दौरान भी यह गठबंधन कांग्रेस के महागठबंधन पर भारी पड़ सकता है। इसका कारण पिछले चुनाव के दौरान तीनों पार्टियों को मिले वोट हैं। 2014 में भाजपा-जद (यू)-लोजपा का कुल वोट शेयर 52.40 फीसदी बनता है। यदि यह वोट शेयर कायम रहा तो कांग्रेस के गठबंधन को काफी नुक्सान हो सकता है। दोनों गठबंधनों में परिवारवाद को बढ़ावा दिया गया है, इसका दोनों को नुक्सान होने के आसार हैं।

भाजपा-जद (यू) के रिश्ते का इतिहास 
बिहार में भाजपा और जद (यू) का सियासी रिश्ता 1996 में केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के समय शुरू हुआ था। उस समय नीतीश कुमार की समता पार्टी ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को समर्थन दिया था। हालांकि यह सरकार 13 दिन में गिर गई थी लेकिन इस समर्थन के साथ बिहार की राजनीति में एक नई शुरूआत हुई थी। 1998 में एक बार फिर जब एन.डी.ए. ने आम चुनाव जीता तो उसे समता पार्टी का समर्थन मिला लेकिन 13 महीने बाद यह सरकार गिरने के बाद 1999 में हुए आम चुनाव में नीतीश कुमार की नई बनी पार्टी जद (यू) भाजपा के साथ गठजोड़ करके मैदान में उतरी। उस समय इस गठबंधन ने संयुक्त बिहार की 54 सीटों में से 41 पर कब्जा कर लिया था। इनमें से 23  18 सीटें जद (यू) के खाते में गई थीं।

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हालांकि 2004 में यह गठबंधन बिहार की 40 सीटों में से 11 पर सिमट गया था लेकिन 2009 में इस गठबंधन ने एक बार फिर वापसी की और बिहार में 32 सीटें जीत लीं। इसमें से 20 सीटें जद (यू) और 12 सीटें भाजपा ने जीतीं। 2010 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ छपी अपनी तस्वीर से नीतीश इतने उखड़े कि अंतत उन्होंने पिछले आम चुनाव से पहले भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ लिया और अकेले चुनाव में उतरे लेकिन भाजपा के बिना मैदान में उतरने से नीतीश को नुक्सान हुआ और जद (यू) 2 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद नीतीश की पार्टी ने अपने धुर विरोधी रहे लालू यादव के साथ हाथ मिलाया और 2015 का विधानसभा चुनाव मिल कर लड़ा लेकिन इससे राजद को ज्यादा फायदा हुआ। अब एक बार फिर नीतीश अपने पुराने सहयोगी भाजपा के साथ हैं और इस गठजोड़ में राम विलास पासवान भी शामिल हैं। पिछले चुनाव में इन तीनों का कुल वोट मिलाकर 52 फीसदी था। लिहाजा कागजों पर यह गठजोड़ मजबूत नजर आ रहा है।

भाजपा-जद (यू)-लोजपा की मजबूती 

  • केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी और राज्य में नीतीश  कुमार का विश्वसनीय चेहरा।
  • गठबंधन में लडऩे का सफल इतिहास।
  • 3 पार्टियों का वोट शेयर मिला कर 50 फीसदी से ज्यादा।
  • भाजपा का वोटर नीतीश कुमार के  साथ जुड़ाव महसूस करता है।
  • तीनों पार्टियों का राज्य में मजबूत कैडर बेस।

विपक्षी गठंबधन की कमजोरी 

  • राजद को छोड़ कर किसी पार्टी का मजबूत कैडर नहीं।
  • सीटों के आबंटन को लेकर खींचतान।
  • गठबंधन के स्टार प्रचारक लालू यादव जेल में हैं।
  • गठबंधन की छवि मौकापरस्त नेताओं की बन रही है।
  • सहयोगियों की सीटों पर कांग्रेस और राजद का  फोकस नहीं बनेगा।

2014 का वोट शेयर (प्रतिशत में)

भाजपा जदयू लोजपा कुल
29.86 16.04 6.50 52.40

बिहार में भाजपा-जद (यू) गठबंधन का सफर

1999 कुल सीटें: 54 भाजपा+41  विपक्ष 13
2004 कुल सीटें 40 भाजपा+ 11   विपक्ष  29
2009 कुल सीटें 40 भाजपा+ 32  विपक्ष  08

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