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मस्जिदों का हो रहा दुरुपयोग, नई भर्ती रोकने के लिए धर्मगुरु आएं सामने, तभी खत्म होगा आतंकवाद

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श्रीनगर/जम्मू(बलराम/मजीद): कश्मीर में आतंकवाद का खात्मा करने की दिशा में निस्संदेह भारतीय सेना एवं अन्य सुरक्षा बलों द्वारा शुरू किए गए ऑप्रेशन ऑलआऊट को भारी सफलता मिली है, लेकिन घाटी में पनप रही कट्टरता के चलते आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले युवाओं की संख्या में भी तेजी आई है, इसलिए जब तक नई भर्ती रोकने के लिए व्यापक तौर पर काऊंसङ्क्षलग अभियान नहीं चलाया जाता और आतंकवादियों के सफाए की राह में राजनीतिक हस्तक्षेप का रोड़ा अटकना बंद नहीं होता, तब तक आतंकवाद का समूल खात्मा संभव नहीं है।
सबसे अहम है कि स्थानीय इस्लामिक धर्मगुरुओं (मौलवियों) को कश्मीर के युवाओं को आतंकियों के रैंक में भर्ती होने से रोकने के लिए सामने आना होगा, ताकि कट्टरवाद को खत्म किया जा सके, क्योंकि अभी तक यह देखने में आया है कि अलगाववादियों सहित देश विरोधी तमाम ताकतों द्वारा स्थानीय मस्जिदों का दुरुपयोग कर ही कट्टरवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है और मुठभेड़ स्थल पर पत्थरबाज प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा करने में भी इन इबादतगाहों के लाऊडस्पीकर इस्तेमाल हो रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि 8 जुलाई, 2016 को हिजबुल मुजाहिद्दीन के कुख्यात कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में अलगाववादी ताकतें युवाओं के मन में जहर घोलकर उन्हें आतंकवाद की राह में लाने में कामयाब हुई हैं।
यही कारण है कि भारतीय सेना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, राज्य पुलिस आदि तमाम सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुए ऑप्रेशन ऑलआऊट में इस साल में 311 आतंकियों सहित पिछले 3 साल में 674 आतंकवादियों को मौत के घाट उतारे जाने के बावजूद आतंकवादियों की तादाद में कमी नहीं आई है। एक अनुमान के अनुसार अभी भी करीब 250 आतंकवादी घाटी में सक्रिय हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि भारी संख्या में आतंकवादियों को ठिकाने लगाने और भारतीय सुरक्षा बलों की मुख्यधारा में शामिल होने की अपील के बावजूद करीब 600 युवक आतंकी संगठनों में शामिल हो चुके हैं, जबकि पाकिस्तानी एवं अन्य विदेशी आतंकी इससे अलग हैं। हालांकि, सुरक्षा एजैंसियां इस संख्या की पुष्टि नहीं करती हैं।

रमजान पर संघर्ष विराम ने दी ऑक्सीजन
माना जाता है कि ऑप्रेशन ऑलआऊट के चलते सुरक्षा बलों के हाथों आतंकी कमांडरों के ढेर होने के सिलसिले के तहत आतंकवाद जब अपने खात्मे की कगार पर था तो तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की सलाह पर केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा रमजान के पवित्र माह में घोषित किए गए संघर्ष विराम के दौरान आतंकवादी संगठनों को ऑक्सीजन मिल गई, जिससे उनमें नई ऊर्जा का संचार हुआ। जब संघर्ष विराम की घोषणा हुई, उस समय ऑप्रेशन ऑलआऊट पूरे ऊफान पर था और आलम यह था कि सुरक्षा बलों के हाथों आतंकी कमांडरों की लगातार मौतों के चलते कोई आतंकवादी अपने संगठन का कमांडर बनने को तैयार नहीं हो रहा था।  इसके अलावा कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर पोस्टर ब्वॉय बनने वाले आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा था, लेकिन संघर्ष विराम के दौरान आतंकी संगठनों ने बड़े पैमाने पर नई भॢतयां कर खुद को पुनर्जीवित कर लिया।

जम्मू और पंजाब तक पहुंचने लगे आतंकी 
जम्मू क्षेत्र और पंजाब में राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों के रहने के कारण आतंकवादी संगठनों का अस्तित्व समाप्त हो गया था, लेकिन पिछले कुछ दिनों में आतंकवादियों ने इन शांतिप्रिय एवं शांतिपूर्ण क्षेत्रों में भी कुछ वारदातों को अंजाम देकर आतंकवाद की पुनस्र्थापना का प्रयास किया है। विशेष तौर पर कश्मीर में मुंह की खाने के बाद भगौड़े हुए पूर्व हिजबुल कमांडर एवं वर्तमान में अंसार गजवत-उल-हिन्द के मुखिया जाकिर मूसा ने अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद के तहत पंजाब को निशाने पर लिया है। वह पंजाब एवं उत्तर भारत के शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों को गुमराह कर अपने मंसूबों को अंजाम देने की जुगाड़ में है और इन दिनों शायद खुद भी सिख भेष धारण कर पंजाब में छिपा हुआ है।

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मुख्यधारा के दलों की नकारात्मक भूमिका
विडम्बना यह है कि इन युवाओं का महिमा मंडन कर उन्हें आतंकवाद की राह पर जाने के लिए उकसाने का जिम्मा आतंकी और अलगाववादी संगठनों ही नहीं, बल्कि मुख्यधारा की पाॢटयों ने भी संभाला हुआ है। कश्मीर में जो भी पार्टी सत्ता से बाहर हो जाती है, वह न्यायोचित बात कर माहौल सुधारने की बजाय आतंकवादियों एवं पत्थरबाजों के प्रति सहानुभूति जाहिर करते हुए घडिय़ाली आंसू बहाने लगती है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं पी.डी.पी. अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती इसका ताजा उदाहरण हैं, क्योंकि जब वह सत्ता में थीं तो मुख्यमंत्री के तौर पर तमाम सुरक्षा बलों के मंच यूनिफाइड कमांड की अध्यक्ष भी थीं। उस समय जब सुरक्षा बल आतंकवादियों एवं सुरक्षा बलों पर कार्रवाई करते थे तो वह इसे न्यायोचित ठहराते हुए लोगों से सवाल करती थीं कि सैन्य शिविर पर लोग क्या दूध और टॉफी लेने जाते हैं, जबकि आज उन्हें सेना की कार्रवाई में खोट और मृत आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का अहसास होता है। इससे पहले नैशनल कांफ्रैंस के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारूक अब्दुल्ला आतंकवादियों की तारीफ में कसीदे पढ़ चुके हैं।

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