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प्रांतवाद का खतरा: कहीं गली-मोहल्लों का गणतंत्र ना रह जाए भारत

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नई दिल्ली: लौह-पुरुष सरदार पटेल जिनके अथक प्रयत्नों से देश का राजनीतिक एकीकरण सम्भव हुआ, उन्हें देश किस तरह याद करता है, एक भारतीय या फिर गुजराती के रूप में। इसका उत्तर निश्चय ही भारतीय होगा। लेकिन पिछले दिनों तथाकथित ठकोर सेना द्वारा प्रायोजित ढंग से बिहारी समेत समस्त हिंदी-भाषियों के खिलाफ चलाए गए हिंसक आंदोलन ने सरदार पटेल के सारे प्रयत्नों को महत्वहीन बनाने का अक्षम्य अपराध किया है।

सरदार पटेल तो देश का राजनीतिक एकीकरण कर दुनिया से विदा हो गए किन्तु आने-वाली पीढिय़ां देश का भावनात्मक एकीकरण नहीं कर सकीं। यह एक कड़वी सच्चाई है और गुजरात की घटनाएं इसी का जीता-जागता प्रमाण है। हिंसक घटनाओं ने गुजरात के एक विकासशील प्रदेश होने की छवि तो धूमिल की है, साथ ही उद्योग-धंधों पर भी बुरा प्रभाव डाला है। जिस तरह हर बिहारवासी ने नन्ही बच्ची से बलात्कार की घटना की निंदा की है उसी प्रकार आम गुजराती भी इसके बदले हुई प्रतिहिंसा का समर्थन नहीं करते।

आंतरिक माइग्रेशन आंकड़ों की नजर से
अब कुछ आंकड़ों पर भी नजर डालें, देश की कुल आबादी का 37 प्रतिशत वो भी है जो अपने राज्य से अलग दूसरे राज्यों में प्रवास करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे देश में इनकी कुल संख्या 45.36 करोड़ थी। अर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण बिहार समेत अन्य हिंदी भाषी  प्रदेशों से महाराष्ट्र, दिल्ली व गुजरात में अंतर्राज्यीय माइग्रेशन का प्रतिशत ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र और दिल्ली के बाद गुजरात देश का तीसरा बड़ा राज्य है, जहां सबसे अधिक आंतरिक माइग्रेशन होता है।

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यूनेस्को की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात के सूरत शहर की कुल आबादी का 58 प्रतिशत प्रवासी आबादी है, जो देश में सबसे अधिक है। दिल्ली व मुम्बई में ये 43 प्रतिशत है। इन शहरों की आर्थिक प्रगति के पीछे  इस प्रवासी आबादी का बड़ा योगदान है। इतना ही नहीं लाखों की संख्या के कारण चुनावी राजनीति के लिए भी ये महत्वपूर्ण हो चुके हैं। आंकड़े ये भी बताते हैं कि बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 0-14 आयुवर्ग की जनसंख्या अन्य राज्यों से अधिक है। अत: देश की श्रमशक्ति में इनका योगदान औरों से ज्यादा है। इस क्षमता का सम्मान होना चाहिए।
संकुचित प्रांतवाद से एकता को खतरा
देश की एकता और अखंडता को आज कई तरफ से खतरा है। एक बड़ा खतरा संकुचित प्रांतवादी सोच से भी है, जिसे अक्सर कभी महाराष्ट्र में एमएनएस, गुजरात में ठकोर सेना व आसाम में बोडो जैसे संगठन हवा देते रहते हैं। यदि इसे बढऩे दिया गया तो फिर भारत गली-मोहल्लों का गणतंत्र रह जाएगा, जिसमें किसी को अपने घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखने की आजादी नहीं होगी। फिर न तो गुजरात के लोग हरिद्वार, केदार-बद्री या जगन्नाथ पुरी के दर्शन कर पाएंगे और न ही देश के अन्य भाग के लोग द्वारका या सोमनाथ के। व्यापार-धंधे सिर्फ राज्यों में सीमित होकर रह जाएंगे। पिंजरा भले सोने का हो पर वो किस काम का। इतने पलायन के बावजूद पटना में नवरात्रि के दौरान गुजरात के गरबा और डांडिया का आयोजन हो रहा है। क्या ये मामूली बात है? संकीर्ण राजनीति देश को तोड़ती है, संस्कृति देश को जोड़ती है। देश की सांस्कृतिक एकता की चेतना को बनाए रखने के लिए हर प्रदेश की राजधानी में दूसरे राज्यों के सांस्कृतिक दूतावास खोले जाने चाहिए। ताकि ऐसे संकुचित प्रांतवादी सोच को उभरने का मौका ही न मिले।
प्रवासी श्रमिक गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर
वास्तव में ये प्रवासी श्रमिक गुजरात के बाहर उसके असली ब्राण्ड एम्बेसडर हैं। उन्होंने न सिर्फ गुजरात के आर्थिक विकास में अपना योगदान दिया है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विशेष तौर पर हिंदी भाषी प्रदेशों में उसकी संस्कृति और सम्मान को भी फैलाने का काम किया है। अपने मुख्यमंत्रित्व के आखिरी दौर में खुद नरेंद्र मोदी भी गुजरात में बसे प्रवासी बिहारियों के विशाल सम्मेलनों को कई बार सम्बोधित कर चुके हैं। इसके बाद वे लाखों बिहारियों के चहेते बन गए गुजरात में भी और बिहार में भी। निश्चय ही देश को सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से जोडऩे का उनका यह एक सराहनीय प्रयास था, जिसने प्रवासी बिहारियों के मन में गुजरात के प्रति आत्मविश्वास और प्रेम का संचार किया। इसे कायम रखने की जरूरत है।

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