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दारू के ठेकों पर ऐसी डार्क कामेडी

दारू के ठेकों पर
ऐसी डार्क कामेडी

लेखक प्रकाश भटनागर

मध्यप्रदेश के निर्विवाद रूप से मशहूर स्टैंड अप कामेडियन रहे केके नायकर ने अपने शीर्ष वाले दौर में चाट के ठेले पर एक कॉमेडी आइटम पेश किया था। इसमें वह कहते हैं कि पानी फुल्की के लिए खाली कटोरा हाथ में लेते ही हमारा राष्ट्रीय चरित्र नजर आ जाता है। जाहिर है कि उनका आशय भीख मांगने वाली स्थिति का था। यह बात जिस समय कही गयी, तब देश विकासशील वाली स्थिति में भी नहीं था। चारों ओर भयानक समस्याएं थीं और लोगों के दर्द से वाकिफ नायकर ने महंगाई की मार दर्शाते एक आइटम में किसी शख्स द्वारा, ‘जय गणेश’ कहने का जवाब ‘जय कांग्रेस’ वाले कटाक्ष के साथ दिया था।

आज स्थिति लगभग पूरी तरह बदल चुकी है। देश कटोरा थामे वाली बुरी छवि से उलट स्थिति में है। मुल्क की कई पुरानी समस्याओं के लिए कांग्रेस पर कटाक्ष करना नायकर जैसे किसी एक कमेडियन की बजाय देश की बहुत बड़ी आबादी का प्रिय शगल बन चुका है। नायकर आज सक्रिय होते तो उन्हें देश का नया राष्ट्रीय चरित्र मिल गया होता। इस सोमवार से वे उस भीड़ को देश का मूल करैक्टर बताकर श्रोताओं की खूब तालियां बटोरते, जो भीड़ चालीस दिन के लॉक डाउन के बाद यहां-वहां शराब की दुकानों पर टूट पडी है। इसके चलते कई जगह तो कानून-व्यवस्था का संकट उठ खड़ा हुआ। लॉक डाउन के हटने पर इस रूप में अराजकता की जो स्थिति बनी, यह तो वाकई शर्मनाक है। विचारणीय है। कारण, इस हुजूम के अधिकांश चेहरे वे थे, जिनके लिए बीते कई दिनों से कहा जा रहा था कि कोरोना के कारण लागू लॉक डाउन के चलते वे भूखों मरने की कगार पर आ गए हैं। कमाई के सारे रास्ते बंद हो जाने के कारण उनके सामने परिवार का पेट पालने का संकट उठ खड़ा हुआ है।

उनकी तस्वीरें दिखा-दिखाकर आम जनता से आर्थिक मदद मांगी गयी। केंद्र सरकार के एजेण्डानिष्ठ विरोधियों ने ऐसे लोगों की ‘कहानियां’ परोस कर नरेंद्र मोदी के विरुद्ध प्रचार वाली खुराक का बंदोबस्त करने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। मजे की बात यह कि इस तरह के ही चेहरे मोदी समर्थकों या फिर राजनीतिक रूप से तठस्थ लोगों के लिए भी कोरोना से पीड़ित मानवता के प्रतिनिधि बन गए थे। आज वे सभी गला तर करने की पर्याप्त खुराक लायक धनराशि का बंदोबस्त कर मयखानों की रौनक बढ़ाते दिख गए। जिस स्व:स्फूर्त अंदाज में यह व्यापक दृश्य देश के कई हिस्सों में दिखा, उसमें सोशल डिस्टेंसिंग की वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत को कई जगह खूंटी पर टांग दिया गया। जो कोरोना इस तरह के असुरक्षित जमावड़े के चलते सबसे तेजी से पनपता है, उसी वायरस की कोई भी परवाह इन लोगों ने नहीं की।

इसके चलते यह हुआ कि कई जगह शराब की दुकानों को तुरंत ही बंद करना पड़ गया। जहां ऐसा नहीं हुआ, वहां भी यह पूरी सम्भावना है कि ऐसा करना ही पडेगा। लोग यूं आचरण कर रहे हैं, जैसे कि आज के बाद शराब फिर कभी मिलेगी ही नहीं। गोया कि सोमवार को शराब पीने का ऐसा पुण्य नक्षत्र टाइप का मुहूर्त है, जो निकल गया तो फिर भयावह अनिष्ट होना तय है। यदि लॉक डाउन की समाप्ति वाले हिस्सों में सुबह सात से शाम सात बजे तक यही नजारा जारी रहा (जो होना तय है) तो यकीन मानिये कि कोरोना से बचने के लिए अब तक किये गए सारे प्रयास किसी भी समय निरर्थक साबित हो जाएंगे और कुछ पियक्कड़ों की वजह से समूची आबादी एक बार फिर लम्बे समय के लिए लॉक डाउन झेलने के लिए मजबूर कर दी जाएगी।

इस सबसे शिवराज सिंह चौहान सरकार का अलर्ट होना बहुत जरूरी हो गया है। मध्यप्रदेश में मंगलवार से भोपाल, इंदौर, उज्जैन सहित कुछ अन्य शहरी क्षेत्रों को छोड़कर तमाम जगहों पर शराब की दुकानें खुल जाएंगी। वहां भी आज जैसी अराजकता और असुरक्षा दिखना तय है। उस राज्य के लिहाज से यह सब बहुत घातक साबित हो सकता है, जो राज्य कोरोना के लिहाज से देश के चार सबसे खतरनाक स्थानों में शुमार है। अड़तीस जिलों में अब कोरोना के शिकार मौजूद हैं। सरकार को तय करना होगा कि शराब की दुकानों के खुलने के बावजूद सोशल डिस्टेंसिंग की अवधारणा जराभी प्रभावित नहीं हो पाए। यह उस महामारी का मामला है, जिसमे सावधानी हटने पर दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधे-सीधे ढेरों मौत वाला मंजर सामने आने की आंशक मुहं बाएं खड़ी होगी। आज पियक्कड़ों ने बता दिया कि दारू की तालब के आगे उनके लिए स्वयं और दूसरों की भी जिंदगी की कोई कीमत नहीं है। उनकी इस मानव बम सृदश फितरत को कोई भी बदल नहीं सकता है। निश्चित ही राजस्व की भारी-भरकम आय के चलते शराबबंदी जैसा निर्णय लेना भी आसान नहीं है। यह तो बहुत कठिन नहीं है कि शराबियों को भी कठोर तरीके से लॉक डाउन का पालन करने के लिए बाध्य कर दिया जाए। ऐसा करना इस समय की बहुत बड़ी जरूरत ान गया है। लेकिन पुलिस को हर जगह कहां-कहां खपाया जा सकता है। शुरू में मैंने केके नायकर को जो याद किया गया, वो अकेले स्टैंड अप कॉमेडी किया करते थे। लेकिन उन्हें जिनके सन्दर्भ में याद किया, वे दारू के ठिकानों पर स्टैंडअप वाली मुद्रा में ही ‘डार्क कॉमेडी’ करते दीख गए। आप जानते ही हैं ना कि डार्क या ब्लैक कॉमेडी वह विद्या है, जिसमे बेहद दर्दनाक अथवा गंभीर विषयों को हलके तौर पर प्रस्तुत किया जाता है। शराब की दुकानों पर कोरोना के रोना से परे दिख रहे इतने हृदय विदारक दृश्य वह डार्क कॉमेडी है, जिसके लिए वांछित स्टैंड अप कामेडियन्स की इस मुल्क में कोई कमी नहीं है। कम से कम आज के घटनाक्रम से तो यह साफ हो गया है। मध्यप्रदेश सरकार चाहे तो अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकती है।

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