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आलेख : अब नहीं चलेगी चीन की आक्रामकता – हर्ष वी. पंत

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर हालिया तनातनी के बाद विगत शनिवार को दोनों पक्षों के बीच साढ़े पांच घंटे की वार्ता भी हो गई, जिसमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। दोनों देशों के बीच करीब 3,488 किलोमीटर में फैली एलएसी का उचित सीमांकन नहीं हुआ है, जिस कारण यह दोनों देशों के बीच यदा-कदा होने वाली अदावत का अखाड़ा बन गई है। हालांकि इस साल तल्खी को नया आयाम मिला जब दोनों देशों ने लद्दाख के दुर्गम और ऊंचे इलाकों में यकायक अपना सैन्य जमावड़ा बढ़ा दिया। अब भले ही दोनों देश सैन्य और कूटनीतिक स्तरों पर समाधान में जुटे हों, लेकिन इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता कि पूर्वी लद्दाख में दोनों पक्षों के बीच महीने भर से अधिक कड़वाहट भरा टकराव जारी रहा। भारत ने शुरुआत में इसे अधिक तूल नहीं दिया, लेकिन मई के अंत तक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वयं यह स्वीकार किया कि पूर्वी लद्दाख के भीतरी इलाकों में भारी संख्या में चीनी सैनिक जमा हो गए। उनका बयान यह भी रेखांकित कर रहा था कि हालात से निपटने के लिए भारत ने जरूरी कदम उठाए हैं।
वर्ष 2017 में 73 दिन तक चले डोकलाम गतिरोध के बाद यह दोनों देशों के बीच उत्पन्न् हुआ सबसे तल्ख और गंभीर मसला है। अबकी बार इसकी चिंगारी मई की शुरुआत में तब सुलगी, जब पूर्वी लद्दाख के पेंगोंग सो इलाके में दोनों पक्ष के सैनिक हिंसक संघर्ष में उलझ गए। इसके कुछ दिन बाद सिक्किम के नाकू ला में भिड़ंत की खबरें आई। यह आग कुछ बुझी तो मालूम पड़ा कि भारत पेंगोग सो के जिस इलाके में सड़क निर्माण कर रहा है, वहां पर चीन ने न केवल अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा दी, बल्कि अपनी निर्माण गतिविधियां भी तेज कर दीं। इसके जवाब में भारतीय सेना ने भी इन इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी।
भारत और चीन के बीच मौजूदा तनातनी को स्थानीय पहलुओं के चश्मे से भी देखा जा सकता है। दोनों पक्ष एलएसी के इर्द-गिर्द बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहे हैं। भारत पेंगोंस सो के साथ ही गलवन घाटी में दार्बुक-शायोक-दौलत बेग ओल्डी को जोड़ने वाली सड़क भी बना रहा है। इसे ही चीन की त्यौरियां चढ़ने का तात्कालिक कारण माना जा रहा है।
बहरहाल, मौजूदा घटनाक्रम में दिलचस्प पहलू यही है कि यथास्थिति में बदलाव को लेकर अभी तक भारत चीन के सामने शिकायत करता रहा है, लेकिन इस बार चीन ने भारत द्वारा सड़क निर्माण पर आपत्ति जताई है। गत वर्ष भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के दर्जे में बदलाव कर लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से विलग करने के बाद परिदृश्य बदल गया। हालांकि भारत ने स्पष्टीकरण दिया था कि इससे एलएसी की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा, फिर भी चीन ने इसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक में आवाज उठाई, लेकिन वह अपनी मुहिम में सफल न हो सका।
असल में बीजिंग को अंदेशा है कि अब भारत अक्साई चिन के उस 37,000 वर्ग किलोमीटर के हिस्से पर भी दावा कर सकता है, जिस पर चीन कब्जा जमाए बैठा है। लिहाजा चीन के लिए इस मोर्चे पर चुनौती बढ़ गई है।
यही कारण है कि एलएसी और एलओसी पर बुनियादी ढांचा मजबूत कर रहे भारत के प्रयासों में चीन अड़ंगा लगा रहा है, क्योंकि इससे भारत को सामरिक मोर्चे पर बढ़त हासिल होगी जो चीन कभी नहीं चाहेगा। इससे चीन की बीआरआइ और सीपैक जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए भी चुनौती बढ़ेगी। ऐसे में भारत जहां अपने मोर्चे को मजबूत बना रहा है, वहीं बीजिंग इसी कोशिश में है किसी तरह यथास्थिति बरकरार रखी जाए।
इस बीच यह अनदेखा नहीं किया जा सकता कि इस विवाद ने उस समय दस्तक दी, जब चीन कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। दक्षिण चीन सागर से ताइवान, हांगकांग से लेकर अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध जैसे तमाम पहलुओं पर चीनी विदेश नीति लगातार आक्रामक होती जा रही है। वहां घरेलू तनाव बढ़ रहा है। सुस्त पड़ती आर्थिक वृद्धि और कोरोना महामारी से लचर तरीके से निपटने को लेकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीसी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के खिलाफ असंतोष बढ़ा है। वास्तव में समस्याओं से ध्यान भटकाने और राष्ट्रवाद की भावना को गति देने के लिए सैन्य तौर-तरीकों का इस्तेमाल तानाशाही शासकों का सबसे आम नुस्खा होता है। ऐसे में चीनी नेताओं को यही लगता है कि जब पूरी दुनिया और खुद चीन कोविड-19 के झटके से उबरने में लगा हुआ है, तब यही वक्त भौगोलिक सीमा के विस्तार के लिहाज से सबसे मुफीद है।
इधर भारत भी बीजिंग के कदमों को लेकर नाखुशी जाहिर करने में अधिक मुखर हुआ है। ट्रंप जैसे तुनकमिजाज राष्ट्रपति के दौर में भी अमेरिका के साथ भारत के संबंध निरंतर बेहतर होते गए। ऑस्ट्रेलिया, जापान, इंडोनेशिया, वियतनाम, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे समान विचारों वाले साथियों के साथ भारत अपनी सक्रियता से हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति को नई दिशा देने में जुटा है।
हाल के दिनों में नई दिल्ली के कई कदम चीन को चुभे होंगे। जैसे भारत ने हाल में चीनी निवेश के लिए नियमों को सख्त बना दिया। उसने कोरोना को लेकर चीन की संदिग्ध भूमिका की जांच की मांग कर रहे देशों का समर्थन किया। वहीं दो भारतीय सांसदों ने ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन के शपथ ग्र्रहण समारोह में हिस्सा भी लिया। ऐसे में सीमा विवाद के जरिये चीन की मंशा भारत पर कुछ बढ़त हासिल करने की भी हो सकती है।
अमेरिका ने भी चीन के लगातार आक्रामक होते जा रहे तेवरों से निपटने की जरूरत जताई है। चीन के कद को घटाने के मकसद से मौजूदा विवाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता की कोशिश भी की थी, लेकिन भारत और चीन दोनों ने उनकी इस पेशकश को खारिज कर दिया था। दोनों देशों के बीच भले ही हाल में तनाव बढ़ा हो, लेकिन भारत और चीन दोनों ने इसे बड़े विवाद का रूप न देते हुए सार्थक बातचीत के जरिये सुलझाने पर सहमति जताई है।
वैसे एशिया की इन दो बड़ी शक्तियों के बीच सीमा को लेकर यह न तो पहला और न ही आखिरी गतिरोध है। इसे लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक नजरिये हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल वास्तविकता यही है कि चीन के उभार के साथ ही भारत भी खुद को मजबूत बनाने में जुटा है। दोनों देशों समेत पूरी दुनिया को भविष्य में और बड़े संघर्षों से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए।
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