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संपादकीय: क्यों राखी का हक़ भाई की कलाई को

राखी सरोज :-

भारत देश में हिंदू द्वारा बनाया जाने वाला त्यौहार रक्षाबंधन, बहन और भाई के प्रेम का प्रतीक माना जाता है। एक  त्यौहार जिस पर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी नामक धागा बांधती है और भाई, बहन को उसकी रक्षा करने का वचन देता है। किंतु जेहन में सवाल आता है इस त्यौहार की संदर्भ में क्यों रक्षाबंधन भाई और बहन के प्रेम का प्रतीक माना जाता है। क्यों यह त्यौहार दो भाइयों के बीच यह दो बहनों के बीच प्रेम का प्रतीक नहीं है। क्या प्रेम केवल बहन-भाई के बीच में ही संभव है। दो भाइयों यह दो बहनों के बीच में क्या प्रेम नहीं होता। हमेशा एक भाई ही क्यों रक्षा का वचन देता है, एक बहन क्यों नहीं अपने भाई को रक्षा का वचन देती हैं। ऐसा लगता है जैसे समाज में केवल स्त्रियों की रक्षा जरूरी है। पुरुष को ना रक्षा की आवश्यकता है ओर ना रक्षा का वचन पाने का हक़।
ऐसा लगता है जैसे हम पुरुष प्रधान समाज में रहते हुए, पुरुष प्रधान सोच के हिसाब से ही त्यौहार बनातें हैं। आज आभाष होता है स्त्रियों को बचपन से ही एक त्यौहार की मिठास में पुरुष प्रधान समाज की सोच का ज़हर घोल कर इस मानसिकता के साथ पाला जाता है कि तुम कमजोर हो, तुम्हें रक्षा की आवश्यकता है ओर रक्षा करने का अधिकार पुरुष को है।  प्रेम के प्रतीक त्यौहार का विरोध करना या फिर आपके मन में किसी त्यौहार के लिए कड़वाहट घोलना नहीं है। बस एक कोशिश है पुरानी परंपराओं के बोझ को जब हम अपने कंधों से उतार रहे हैं। तब क्यों नहीं हम पुरानी सोच में जकड़े त्यौहारों को भी आजाद कर दे।
21वीं सदी में क्यों नहीं हम अपनी पुरानी सोच को बदलते हुए किसी भाई की कलाई को केवल इसलिए खाली देखें क्योंकि उसकी कोई बहन नहीं है या किसी बहन की राखी को इसलिए सुना देखें क्योंकि उसका कोई भाई नहीं है। लिंग के आधार पर अपने त्यौहारों में भेदभाव कर अपने ही जीवन में कमी रखना उचित नहीं है। हमें आतें कल के साथ बीते कल को छोड़ नए कल की रचना करने के लिए कदम बढ़ाना होगा। रक्षाबंधन को भाई-बहन हो या भाई-भाई हो या बहन-बहन सभी के प्रेम का प्रतीक मान कर जिंदगी भर एक दूसरे के साथ देने ओर रक्षा करने का वचन देना चाहिए।
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