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आजादी के सच्चे मायने कही खो ना जाएं

राखी सरोज :-
कुछ दिनों में भारत देश की आजादी के तिहत्तर साल पूरे होने जा रहे हैं। एक ऐसा दिन जिसे भारत के त्यौहार की तरह बना कर अपनी खुशी जताते है। किंतु इतने दिन की आजादी में हमने क्या पाया है यह समझना जरूरी है। तिहत्तर साल की आजादी में हमने क्या वही देश बनाया है जिसका सपना आजादी के समय हर भारतीय की आंखों में था। यह विचार करना जरूरी है कि हमने क्या पाया है और क्या दें रहें अपनी आने वाली पीढ़ी को ताकी आने वाला समय इस आजादी को उसी तरह से याद रख सकें, जिस तरह से हम रखतें हैं।
21 वीं सदी में हमारे देश की क्या स्थिति है। जब भ्रष्टाचार हमारे देश की नींव को खोखला कर आम इंसान के जीवन को पूरी तबाह कर रहा है। देश के आम लोगों का पैसा चुरा कर लोग बाहरी देशों में जा कर अपना जीवन आराम से गुजार रहे हैं और जिनका वह पैसा है वह दिन-रात खून के आंसू रो रहें हैं। आज दिल में एक विचार आया है कि क्या हमने यह आजादी इस लिए पाई थीं क्या कि चंद लोगों के हाथों में पैसा और ताकत रहें और पूरे देश की जनता अपना जीवन आभाव में जीतें रहें।
हमारे देश में 83.6 करोड़ के करीब ऐसे लोग हैं जिनके पास खाने के लिए दो वक्त का खाना भी नहीं है। वहीं दूसरी ओर चंद लोग ऐसे हैं जिनकी थाली में रोज़ हजारों-लाखो का खर्चा होता है। हमें विचार करना होगा कि हम क्या कर रहे हैं अपने देश के लिए, जहां हम अपनों का ही जीवन मुश्किल बना रहें हैं। धर्म और जाति की राजनीति हमारे लिए एक आम बात है। हमारे यहां आम व्यक्ति का जीवन कितना भी अधिक दुखों से ग्रस्त हो किंतु हम वोट धर्म और जाति के आधार पर ही देते हैं।
हमारे देश में प्रत्येक दिन धर्म और जाति के आधार पर अखबार और समाचार रंगे नजर आते हैं। कभी दलित के नाम पर कभी पंडित, तो कभी मुस्लिम किसी ना किसी को आधार बनाकर हमारे यह समाचार और अखबार हर दिन आम जनता को आजादी के मायने समझाते रहते हैं। 1947 में आजादी के समय बंटवारे की लकीर ने जमीन पर खींच कर जितना दर्द दिया। उससे कई अधिक दर्द आज की स्थिति देख होता है। जहां अपने स्वार्थ के लिए देश को बर्बाद किया जा रहा है। भ्रष्टाचार और स्वार्थ को हमने अपनी संस्कृति और जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। हम अपने देश को खोखला कर रहें हैं।  आज के समय में हम हर कार्य बस अपने लाभ के लिए कर रहे हैं। आज ताकत और रूपयां हर कोई किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है।
2020 की शुरुआत से ही हम सभी देशवासी संघर्ष की स्थिति से गुजर रहे हैं। आज जब हम विश्व शक्ति बनने का सपना देख रहे हैं। उस समय दंगे, भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर राजनीति, शिक्षा के मंदिरों में साजिश और कानून का डंडा देखने के साथ ही साथ अब तक की सबसे ख़तरनाक महामारी से लड़ रहे हैं। जल्द ही आजादी के 73 साल पूरे होने जा रहे हैं, किन्तु अभी तक हम अपने सभी देशवासियों रोटी, कपड़ा और मकान जैसी आम मौलिक जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाएं। जब कि यह हर व्यक्ति का मनुष्य होने का अधिकार है। जब लोग भूख से परेशान हो छत और अपनों की चाहत में कोषों मिल की दूरी पैदल तैं करें बिना अपने पैरों के छालों को देखें मौत के आगोश से भी ना डरें। तब यह विचार करना जरूरी है कि हम किसी बात की खुशी बना रहें हैं।
यदि हमारे देश में कुछ राज्यों में हर साल आने वाली बाढ़ से बचाने के लिए सरकार कोई विचार करना जरूरी नहीं समझती है। चाहे फिर उस बाढ़ के पानी में इंसान का सब कुछ तबाह हो जाएं और भविष्य के सपने दम तोड़ दें। तब क्या एक दिन झंडा फैला कर हम झूठी मुस्कान दिखा कर महान देश होने का झूठा सपना कब तक देखने वाले है।
हमें ज़मीनी तौर पर अपने यहां बदलाव करने की जरूरत है। देश हमारा है इसकी रक्षा हमें करनी है। इस देश में होने वाला प्रत्येक कार्य हमारा कार्य है। हम किसी झूठी उम्मीद के सहारे अपने देश को हजारों सालों तक कुछ चंद लोगों की ताकत का गुलाम नहीं बनने दें सकते हैं। हमें अपनी आवाज उठानी होगी और वह कार्य करने होंगे जिसमें हमारी आने वाली पीढ़ी के साथ ही साथ हमारे देश का भला हो। हमें एक देशवासी बन हर देशवासी के हित की बात सोचनी होंगी। धर्म और जाति के जहर से खुद को आने वाले कल को बचाने का प्रयास करना होगा।
देश के लिए, देश की आबादी के लिए, देश की आजादी के लिए हमें अपनी आंखों पर पड़े पर्दों को हटा कर सच को अपना कर देश भलाई के लिए आवाज उठानी होगी। हम भारतीय है यह कहते हुए केवल गर्व ना हों, घमंड हो। हम भारतीय हैं 130 करोड़ जनसंख्या वाला लोकतांत्रिक देश। जहां हर कोई आज़ाद है हर किसी के पास मौलिक अधिकार ही नहीं मौलिक सुविधाएं भी हो।
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