दूसरी लहर को लेकर व्यर्थ का दोषारोपण: संजय गुप्त

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कोविड महामारी की दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह धीरे-धीरे ही सही, थम रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का आकलन है कि यह लहर कम तो हो रही है, पर इसके निष्क्रिय होने में समय लगेगा और इसीलिए तमाम शहरों में लॉकडाउन बरकरार रखना पड़ेगा। भारत जैसे विकासशील देश में लॉकडाउन लंबे समय तक बरकरार रखना बेहद चुनौतीपूर्ण है। ध्यान रहे कि पिछले साल कोविड महामारी ने आॢथक तौर पर देश की कमर तोड़ कर रख दी थी। जब अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही थी, तब महामारी की दूसरी लहर आ गई, जो कि अनुमान से बहुत तेज निकली। इस दूसरी लहर में संक्रमण इतना भयंकर है कि पिछले साल जनता जो हौसला दिखा रही थी, वह इस बार नहीं दिखा पा रही। इस बार अन्य लोगों की तरह कारोबार जगत के भी कई लोग संक्रमण की भेंट चढ गए हैं। स्वजनों, कॢमयों और दोस्तों को खोने की पीड़ा झेल रहे कारोबारी समुदाय को अपने हौसले को बनाए रखना होगा और जैसे ही स्थितियां सामान्य होती दिखें, तेजी से सक्रिय होना होगा।

इस समय कोरोना आॢथक तौर पर भी नुकसान पहुंचा रहा है और मानसिक तौर पर भी। दूसरी लहर का ठीकरा किसके सिर फूटे, इसे लेकर देश में भयंकर राजनीति शुरू है। इस राजनीति की शुरुआत तभी हो गई थी जब मार्च के आखिरी सप्ताह में मुंबई और केरल में संक्रमण तेजी से बढ़ रहा था। इसी दौरान हरिद्वार में कुंभ हो रहा था और पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी चल रहे थे। अप्रैल का दूसरा सप्ताह आते-आते संक्रमण दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य इलाकों में भी अपने पैर तेजी से पसारने लगा। इसी के साथ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बंगाल की चुनावी रैलियों का उल्लेखकर उन पर निशाना साधा जाने लगा और कुंभ को लेकर भी सवाल उठाए जाने लगे। ऐसा करने वालों में राजनीतिक दलों के साथ विदेशी मीडिया भी था। मद्रास हाईकोर्ट ने तो चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करते हुए यहां तक कह दिया कि उस पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। जब यह सब हो रहा था, तब भी कोई यह अनुमान लगाने में सक्षम नहीं था कि संक्रमण की दूसरी लहर सुनामी जैसा रूप धारण कर लेगी, लेकिन ऐसा ही हुआ।

महामारी के शिकार लोगों की जो दर्दनाक कहानियां सामने आई हैं, उनसे लोग अंदर तक हिल गए हैं। लोग सरकारों को कोस रहे हैं। लोगों की नाराजगी स्वाभाविक है, लेकिन सुनामी सरीखी आपदा का सामना करने के लिए जो जीतोड़ कोशिश केंद्र सरकार ने की, उसे देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वह हाथ पर हाथ रखे बैठी थी। इन दिनों यह सवाल भी उठ रहा है कि केंद्र सरकार ने पिछले साल नवंबर से लेकर इस मार्च तक ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की कि महामारी की दूसरी लहर का सामना किया जा सके? इस सवाल का जबाव यही है कि औरों की तरह उसे भी इसका भान नहीं था कि दूसरी लहर इस भयंकर गति से आएगी। सच तो यह है कि दूसरी लहर की आशंका जताने वाले स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ भी न तो उसकी तीव्रता का अनुमान लगा सके और न ही इसका कि वायरस का बदला हुआ रूप इस बार युवाओं को भी अपनी चपेट में ले लेगा।

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पिछली लहर के वक्त विपक्षी दलों ने केंद्र पर यह आरोप लगाया था कि सारे निर्णय उसने ले लिए और यदि राज्यों को जिम्मेदारी दी जाती तो स्थिति दूसरी होती। अगर यह सच है तो राज्य बताएं कि उन्होंने केंद्र के स्पष्ट निर्देश और धन आवंटन के बाद भी आक्सीजन प्लांट क्यों नहीं लगाए? वास्तव में राज्य सरकारें भी यह मानकर बैठ गई थीं कि यदि महामारी की दूसरी लहर आई भी तो पहले जैसी होगी। शायद ही किसी ने सोचा हो कि दूसरी लहर में आक्सीजन की मांग दस गुना बढ जाएगी और वह भी दस दिन के भीतर। भारत में ऐसी खतरनाक दूसरी लहर का अनुमान किसी अन्य देश का कोई स्वास्थ्य विशेषज्ञ या संगठन भी नहीं लगा सका। इस सबके बाद भी इसमें दो राय नहीं कि हमारा स्वास्थ्य ढांचा पहले से ही चरमराया हुआ था। वह पहली लहर में ही नाकाफी साबित हुआ था। बीते एक साल में इस ढांचे में जो परिवर्तन लाए जाने चाहिए थे, वे नहीं लाए गए। न अस्पताल बेड बढ़ाए गए और न ही आक्सीजन प्लांट लगाने की चिंता की गई। स्थिति यह रही कि अस्पतालों को जो वेंटिलेटर दिए गए, वे बंद पड़े रहे। यह तब हुआ, जब प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों को बार-बार आगाह करते हुए यहां तक कह रहे थे कि दूसरी लहर को तुरंत रोकना होगा, वरना वह देशव्यापी रूप ले सकती है। इसके अलावा केंद्र सरकार की टीमें राज्यों का दौरा भी कर रही थीं। जाहिर है कि केंद्र को कठघरे में खड़ा कर रहे राज्यों को अपने अंदर भी झांकना होगा।

केवल कुंभ पर सवाल उठाना या बंगाल में प्रधानमंत्री की रैलियों को मुद्दा बनाना भी समस्या के एक पहलू पर ही जोर देना है, क्योंकि रैलियां तो विपक्षी नेता भी कर रहे थे। सच्चाई यह है कि बंगाल से अधिक संक्रमण दिल्ली, बेंगलुरू, गोवा आदि में फैला। यदि एक क्षण के लिए यह मान लें केंद्र समय पर नहीं चेता तो सवाल उठेगा कि आखिर राज्यों ने चेतने से क्यों इन्कार किया? कुंभ और बंगाल की रैलियों को मुद्दा बना रहे लोग यह न भूलें कि उन्हीं दिनों दिल्ली-मुंबई के बीच जमकर आवागमन हो रहा था और गोवा में छुट्टियां-पाॢटयां मनाने वालों का तांता लगा हुआ था। गोवा में संक्रमण गंभीर हुआ तो कुंभ नहाने या बंगाल की रैलियों में शामिल होने वालों के कारण नहीं। इसे विदेशी मीडिया का वह हिस्सा अवश्य समझे, जो दूसरी लहर से उपजे हालात को लेकर भारत को नीचा दिखाने में लगा हुआ है। विदेशी मीडिया को तो यह भी बताना चाहिए कि जब अमेरिका, इटली या ब्रिटेन में कोरोना संक्रमण चरम पर था, तब क्या उनके कैमरामैन-रिपोर्टर कब्रिस्तानों का हाल बयान कर रहे थे? देश का मनोबल गिराने वाली कवरेज से हमें सावधान रहना होगा और देसी-विदेशी मीडिया के शरारात भरे एजेंडे को समझना होगा। गिरा हुआ मनोबल और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हमें महामारी से लडऩे में मदद नहीं करेगा। इस समय जरूरत इसकी है कि हम सकारात्मक रवैये के साथ कोविड प्रोटोकॉल को अपनाकर कोरोना से निपटने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मिलकर प्रयास करें।

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