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क्या प्रदेश में फिर से शुरू होगा तबादला उद्योग? मंत्रियों को जिलों के प्रभार सौंपे जाने के निर्णय में भी सिंधिया की खूब चली

आखिर ऐसी क्या वजह है कि शिवराज सरकार न चाहते हुए भी सिंधिया के आगे हो जाती है नतमस्तक

विजया पाठक लेखिका, एडिटर, जगत विजन
आखिरकार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में पिछले सवा साल से लंबित मंत्रियों को जिले के प्रभार की कमान सौंपने पर निर्णय ले लिया। मुख्यमंत्री के इस निर्णय के बाद से सियासी गलियारों में खासी चर्चाए हो रही हैं। चर्चा का मुख्य विषय है 01 जुलाई से प्रदेश में शुरू हुई ताबदलों की प्रक्रिया। राजनीतकि विश्लेषक मंत्रियों को सौंपे गए जिलों के प्रभार को तबादला उद्योग से जोड़कर देख रहे हैं। कुल मिलाकर लगभग तीन वर्ष पहले जो कांग्रेस सरकार में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया करते थे वही अब शिवराज सरकार में भी देखने को मिलेगा। यही वजह है कि शिवराज सरकार ने तबादला प्रक्रिया शुरू होने के एक दिन पूर्व ही मंत्रियों को जिलों का प्रभार सौंप दिया। खास बात यह है कि जिलों के प्रभार सौंपे जाने की इस प्रक्रिया में भी राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का दबदबा देखने को मिला है। ग्वालियर चंबल इलाके सभी जिलों के प्रभार सिंधिया खेमे के मंत्रियों को सौंपा गया है।

अब सिंधिया मनपसंद अफसरों की अपने क्षेत्रों में पोस्टिंग करवाकर शासकीय जमीनों पर अवैध कब्‍जे करेंगे। सिंधिया के फैसले के खिलाफ मुख्यमंत्री बिल्कुल नहीं गए और ग्वालियर चंबल इलाके में सिर्फ सिंधिया खेमे के मंत्रियों को प्रभार सौंपा। इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिंधिया और उनके खेमे के मंत्रियों की क्या योजना है। ये मंत्री तबादले की इस प्रक्रिया को उद्योग की तरह संचालित करना चाहते हैं जैसा उन्होंने कांग्रेस सरकार में किया था। इनके कारनामों की सजा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को भुगतना पड़ा और देशभर में यह संदेश गया कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ तबादला उद्योग चला रहे हैं। कुल मिलाकर मंत्रियों को सौंपे जाने जिलों से लेकर कैबिनेट में अपनों को स्थान दिलाने और निगम मंडल में अपने चहेतों को बैठाने तक सभी जगह पर सिंधिया की खूब चल रही है। इससे भाजपा सर्मथक कार्यकर्ता, मंत्री और विधायकों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, लेकिन सभी बैचारे चुप्पी साधे बैठे हुए हैं। लेकिन सिंधिया के कारण कहीं न कहीं कार्यकर्ता अपने आपको ठगा महसूस जरूर कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में कुल 52 जिले हैं, लेकिन शिवराज सरकार में कैबिनेट और राज्य मंत्रियों की संख्या कुल 30 है। ऐसे में 22 मंत्रियों को दो-दो जिलों का प्रभार सौंपा गया। वहीं, नरोत्तम मिश्रा और भूपेंद्र सिंह समेत आठ मंत्रियों को एक-एक जिले की जिम्मेदारी दी गई है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश की नई तबादला नीति 01 जुलाई से लागू हो गई है। इसमें पहले अनुसूचित क्षेत्रों के रिक्त पदों को भरा जाएगा। कोरोना से गंभीर रूप से बीमार लोगों को भी प्राथमिकता दी जाएगी। तहसील, जिला व राज्य स्तर पर तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के तबादले प्रभारी मंत्री व कलेक्टर आपसी समन्वय से करेंगे। मप्र के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा नई ट्रांसफर पॉलिसी में 31 जुलाई तक तबादले हो सकेंगे। विधानसभा के बजट सत्र के दौरान कैबिनेट की बैठक में निर्णय लिया गया था कि 1 से 31 मई बीच तबादले हो सकेंगे। लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के कारण नीति को लंबित कर दिया गया था। नई नीति के अनुसार डीएसपी से नीचे के पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के तबादले पुलिस स्थापना बोर्ड करेगा। जिले में प्रभारी मंत्री की अनुशंसा पर पुलिस अधीक्षक पोस्टिंग करेंगे। डीएसपी और उनसे ऊपर के तबादले गृहमंत्री के अनुमोदन के बाद मुख्यमंत्री समन्वय से होंगे। तबादलों को लेकर कई नए नियम भी बनाए गए हैं। प्रथम व द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों के तबादले विभागीय मंत्री के अनुमोदन से होंगे।
निश्चित तौर पर अब प्रदेश में तबादला उद्योग खूब पनपेगा।

सिंधिया समर्थक मंत्री तो इस इंतजार में बहुत पहले से ही बैठे थे। अब जब उन्‍हें मौका मिलेगा तो पैसों की भी खूब बंदरबांट होगी। आखिर में सवाल यही उठ रहा है कि सीएम शिवराज सिंधिया के सामने नतमस्‍तक कब तक होते रहेंगे। क्‍योंकि सिंधिया के कारण छवि शिवराज की भी खराब हो रही है और बीजेपी की भी हो रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में सिंधिया शिवराज को सरकार चलाना मुश्किल कर देंगे। जैसा सिंधिया ने पूर्व सीएम कमलनाथ के साथ किया था। हम देख रहे हैं कि धीरे-धीरे सिंधिया उसी रंग में आने लगे हैं। बस फर्क इतना है कि सिंधिया अभी अड़ नहीं है बाकी तो सब कमलनाथ सरकार के जैसा ही हो रहा है। अब देखना होगा सिंधिया की दादागिरी आखिर कब तक जारी रहेगी।

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