जीवन में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो जाम नदी किनारे खड़े होकर गोटमार की तरह पत्थर बरसाते हैं, और दूसरे वे जो नीम करोली बाबा की तरह प्रेम, करुणा और सेवा का झंडा गाड़ते हैं।
आज का दिन हमें यही सिखाता है कि भीड़ में खड़े होकर पत्थर फेंकना आसान है, लेकिन भीड़ से अलग होकर किसी घायल के घाव पर मरहम लगाना कठिन है। गुस्सा, नफरत और बदले की परंपरा को निभाना आसान है, लेकिन माफी, मिलाप और प्रेम की नई परंपरा शुरू करना साहस का काम है।
कल पांढुर्णा में 1326 लोग घायल हुए, क्योंकि परंपरा के नाम पर पत्थर बरसे। वहीं दूसरी ओर कैंची धाम में आज लाखों लोग बाबा की पुण्यतिथि पर प्रेम का दीप जला रहे हैं। फर्क सिर्फ सोच का है।
याद रखिए, आपके हाथ में जो है आप वही बांटेंगे। यदि मन में पत्थर है तो पत्थर बंटेगा, यदि मन में प्रेम है तो प्रेम बंटेगा। इसलिए आज संकल्प लीजिए कि आप किसी पर पत्थर नहीं, बल्कि उम्मीद, हिम्मत और मुस्कान बांटेंगे।
आपका दिन मंगलमय हो।

