इस्लामाबाद वार्ता पर टिकी दुनिया की नजरें
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष के 39वें दिन एक चौंकाने वाला मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर होने वाले बड़े हमलों को फिलहाल दो हफ़्तों के लिए टालने का ऐलान किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ट्रंप की दी हुई ‘डेडलाइन’ खत्म होने वाली थी।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की मध्यस्थता के बाद ट्रंप ने कूटनीति को एक मौका देने पर सहमति जताई है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह ‘सीजफायर’ वास्तव में शांति की दिशा में एक कदम है या फिर रणनीतिक दबाव का हिस्सा।
ईरान का 10-सूत्रीय प्रस्ताव: शर्तें या समझौता ?
ईरान ने युद्ध रोकने के लिए जो 10-सूत्रीय खाका पेश किया है, वह काफी सख्त और चौंकाने वाला है। तेहरान की मुख्य मांगों में शामिल हैं:
ईरान पर लगे सभी प्राथमिक और माध्यमिक आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना।
जंग में हुए नुकसान का पूर्ण मुआवज़ा।
विदेशों में ज़ब्त की गई ईरानी संपत्तियों को तत्काल जारी करना।
ईरान और ओमान को होर्मुज़ स्ट्रेट (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों से प्रति जहाज लगभग $2 मिलियन (20 लाख डॉलर) ‘ट्रांज़िट शुल्क’ वसूलने की अनुमति।
होर्मुज़ स्ट्रेट पर टोल: वैश्विक व्यापार पर नया संकट ?
इस प्रस्ताव में सबसे विवादास्पद बिंदु होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स लगाना है। अमेरिकी सीनेटर क्रिस मर्फी ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए इसे ट्रंप की “हार” और “सरेंडर” करार दिया है।
जानकारों का मानना है कि यदि ईरान को इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर टोल वसूलने का अधिकार मिलता है, तो दुनिया भर में ईंधन (Fuel) और खाद (Fertilizer) की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति का नया दौर शुरू हो सकता है।
इस्लामाबाद में ‘हाई-प्रोफाइल’ महापंचायत
आगामी शुक्रवार, 10 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक निर्णायक बैठक होने जा रही है। इसमें अमेरिकी डेलिगेशन का नेतृत्व राष्ट्रपति के विशेष दूत **स्टीव विटकॉफ़**, **जेरेड कुशनर** और उपराष्ट्रपति **जेडी वेंस** करेंगे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य दो हफ्ते के अस्थायी युद्धविराम को स्थायी शांति समझौते में बदलना और ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव पर बारीकियों से चर्चा करना है।
जमीनी हकीकत: कागजों पर शांति, सीमा पर बारूद
भले ही व्हाइट हाउस और तेहरान ने ‘सैद्धांतिक’ रूप से सीजफायर स्वीकार कर लिया है, लेकिन बुधवार सुबह तक इजरायल द्वारा ईरान के भीतर हमले जारी रहने की खबरें आईं। इसके विपरीत, ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) ने अपनी सैन्य इकाइयों को ‘होल्ड’ पर रहने का आदेश दिया है। इस विरोधाभास ने विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इजरायल इस समझौते का पूरी तरह हिस्सा है, या फिर यह महज एक ‘डिप्लोमैटिक ड्रामा’ है।
> विशेष विश्लेषण
यह सीजफायर डर का परिणाम है या दबाव का, इसका असली परीक्षण 10 अप्रैल की इस्लामाबाद वार्ता के बाद होगा। क्या अमेरिका होर्मुज़ स्ट्रेट जैसी सामरिक नस ईरान के हाथ में सौंप देगा, या यह दो हफ्ते केवल अगली बड़ी सैन्य कार्रवाई की तैयारी के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं? दुनिया की नजरें अब इस्लामाबाद पर टिकी हैं।

