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11 दिन चली लड़ाई, इजरायल में था बेटा, परिजनों का हुआ यह हाल, अवश्‍य पढ़ि‍ये आंखें नम कर देने वाली यह खबर

मकड़ाई समाचार इंदौर। मध्य-पूर्व में इजरायल और हमास के बीच 11 दिन तक चला संघर्ष बीते शुक्रवार (21 मई) को जैसे ही थमा, मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के एक घर में चल रहा मानसिक और भावनात्मक संघर्ष भी थम गया। दरअसल, इंदौर के विजयनगर क्षेत्र की स्कीम 74-सी में रहने वाले सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर शिवशंकर अत्रे के सुपुत्र ईश्वर अत्रे इजरायल के रेहोवोट शहर में रिसर्च स्कालर हैं। वे बीते चार वर्षों से वहां हैं और प्रतिदिन अपने माता-पिता व बहनों से हैंगआउट के जरिए बात करते हैं।

10 मई को जैसे ही फलस्तीन के आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर राकेट दागना शुरू किए, इंदौर में रह रहे ईश्वर अत्रे के माता-पिता व बहनें चिंता में डूब गए। चिंता स्वाभाविक थी क्योंकि हमास इजरायल के नागरिक रहवासी क्षेत्रों पर राकेट दाग रहा था और इन हमलों में एक भारतीय महिला सौम्या संतोष की मृत्यु हो चुकी थी। हमास ने कुल 3400 राकेट दागे। इस भय व चिंता के कारण अत्रे व उनकी धर्मपत्नी की सांसें अटकी रहीं। उधर, सैन्य संघर्ष चल रहा था, तो इधर माता-पिता का भावनात्मक और मानसिक संघर्ष जारी था। वे अपने बेटे की सुरक्षा के लिए भगवान की पूजा करते रहे, मन्नत मांगते रहे और सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते रहे।

इजरायल में हूं, मुझे कुछ नहीं होगा

रेहोवोट शहर से ईश्वर अत्रे प्रतिदिन हैंगआउट पर बात कर माता-पिता को अपडेट देते। हालांकि वे हमलों की कम और अपने शोधकार्य की बात ज्यादा करते। माता-पिता चिंतातुर होते तो ईश्वर यह कहकर ढांढस बंधाते कि- ‘मैं दुनिया के सबसे सुरक्षित देशों में से एक इजरायल में हूं। मुझे कुछ नहीं होगा। इजरायल में रहने वालों को अपने सुरक्षा तंत्र पर विश्वास है कि ये हमले ज्यादा कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, इसलिए यहां अन्य नागरिकों की तरह मैं भी अपने शोध पर ध्यान दे रहा हूं।”

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संघर्ष थमा तो सांस में सांस आई

पिता शिवशंकर अत्रे बताते हैं- ’10 मई को राकेट दागे जाने के बाद से शुरू हुआ हमारा मानसिक व भावनात्मक संघर्ष अंतत: 21 मई को तब थमा, जब वहां संघर्ष विराम हो गया। मां साधना अत्रे कहती हैं, बेटा हमें फोन पर पौराणिक कथाएं सुनाकर मन शांत रखने को कहता।

हर घर में बंकर, सायरन बजते ही छुपते हैं

इजरायल के हर शहर में घर व दुकानों के नीचे सुरक्षा बंकर बने होते हैं, जो राकेट हमलों से बचा सकते हैं। हमला होते ही सायरन बजता है और लोग तुरंत अपने सब काम छोड़ बंकर में चले जाते हैं। सड़क किनारे सरकार की ओर से सार्वजनिक बंकर भी बनाए गए हैं, ताकि सड़क पर कार से या पैदल जाते लोग तुरंत उन सार्वजनिक बंकरों में जा सकें। हर बंकर में बिजली की सुविधा के साथ खाने-पीने का सामान, दवाई इत्यादी पहले से स्टोर रहती हैं।