हंडिया। हंडिया में मां नर्मदा का सड़क घाट आज अव्यवस्थाओं और गंदगी की दोहरी मार झेल रहा है।जहां तक पक्का घाट बना है,वहां तक पहुंचने पर कुछ हद तक व्यवस्था नजर आती है, लेकिन अब वह हिस्सा भी साफ-सफाई के अभाव में बदहाल होता जा रहा है।
पक्के घाट से जैसे ही श्रद्धालु मां नर्मदा के जल की ओर बढ़ते हैं, उन्हें रेतीले-पथरीले, उबड़-खाबड़ रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है,जहां हर कदम जोखिम भरा है।
स्थिति इतनी खराब है कि जरा सी चूक हादसे में बदल सकती है। अमावस्या जैसे अवसरों पर हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ में यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
पहले थी रेत, अब पथरीला संकट
कुछ वर्ष पहले तक इस घाट पर पर्याप्त रेत हुआ करती थी, जिससे श्रद्धालुओं को स्नान के लिए सहज और सुरक्षित मार्ग मिल जाता था। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। क्षेत्र में रेत के अत्यधिक दोहन के चलते घाट का स्वरूप बिगड़ गया है, और श्रद्धालुओं को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
महिलाओं की गरिमा पर सीधा सवाल
घाट पर बने दो चेंजिंग शेड मुख्य घाट से करीब 100 मीटर दूर हैं।वह भी जर्जर और अनुपयोगी हालत में।जहां स्नान की सुविधा है, वहां शेड नहीं; और जहां शेड हैं, वहां स्नान की व्यवस्था नहीं। नतीजा—महिलाओं को असुविधा और असुरक्षा दोनों झेलनी पड़ रही है।
दिखावे तक सीमित व्यवस्थाएं
जमीनी जरूरत जहां है, वहां सुविधा नहीं; और जहां व्यवस्था बनाई गई, वहां उसका उपयोग नहीं। तस्वीर साफ है—काम कागजों में ज्यादा, जमीन पर कम।
जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
क्षेत्र में ग्राम पंचायत और तहसील कार्यालय दोनों मौजूद होने के बावजूद मूलभूत समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। विकास के दावे तो खूब किए जाते हैं, लेकिन घाट की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
आत्ममंथन की जरूरत
यह केवल प्रशासन की ही नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी है। जो खुद को बड़ा नर्मदा भक्त बताते हैं, क्या वे इस स्थिति पर आवाज उठाएंगे, या फिर आस्था के नाम पर असुविधा और जोखिम को यूं ही स्वीकार करेंगे?
क्या होना चाहिए?
मंदिर के सामने बने पक्के घाट से लेकर मां नर्मदा के जल तक पक्का एवं समतल मार्ग (सीसी रोड) बनाया जाना बेहद जरूरी है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सुगम पहुंच मिल सके। साथ ही घाट क्षेत्र को व्यवस्थित रूप से विकसित करने की आवश्यकता है, जिससे आस्था स्थल की गरिमा बनी रहे।
अब सवाल यही है:
जब जिम्मेदार तंत्र मौजूद है, तो हंडिया घाट की यह बदहाल स्थिति आखिर कब सुधरेगी?
या फिर श्रद्धालु यूं ही जोखिम और असुविधा के बीच अपनी आस्था निभाते रहेंगे?

