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भागीरथपुरा कांड : हाईकोर्ट का सख्त रुख – बिना पोस्टमार्टम और विसरा रिपोर्ट के कैसे तय हुई मौत की वजह?

इंदौर। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने शासन की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने शासन द्वारा पेश की गई 23 मौतों की डेथ ऑडिट रिपोर्ट को अपर्याप्त बताते हुए उसे आई-वॉश (भ्रामक रिपोर्ट) करार दिया। कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा, क्या मृतकों का पोस्टमार्टम किया गया है? विसरा रिपोर्ट कहाँ है? बिना वैज्ञानिक साक्ष्यों के रिपोर्ट का आधार क्या है?

मुख्य सचिव हुए वर्चुअल पेश, कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन वर्चुअली उपस्थित रहे। शासन ने अपनी रिपोर्ट में 23 में से 16 मौतें दूषित पानी से होना स्वीकार किया। हालांकि, रिपोर्ट में प्रयुक्त शब्द वर्बल अटॉप्सी (परिजनों के मौखिक बयानों पर आधारित जानकारी) पर कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए पूछा कि क्या यह कोई आधिकारिक मेडिकल टर्म है? अदालत ने स्पष्ट किया कि मौतों के कारणों की पुष्टि के लिए ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य और क्लिनिकल डेटा अनिवार्य है।

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अधिवक्ता बगड़िया के तीखे तर्क : मुआवजे पर भी घेरा
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अजय बगड़िया ने कोर्ट को बताया कि मृतकों के परिजनों को जो 2-2 लाख रुपये की सहायता दी जा रही है, वह रेड क्रॉस सोसायटी की है, शासन की ओर से अब तक कोई प्रत्यक्ष मुआवजा नहीं मिला है। उन्होंने इसे बढ़ाकर 4-4 लाख रुपये करने की मांग की। इसके साथ ही, नगर निगम द्वारा केवल 8 मानकों पर जल परीक्षण करने को भी कोर्ट ने अपर्याप्त माना, जबकि प्रदूषण मंडल ने पूर्व में 34 मानकों पर जांच की थी। निगम के पाइपलाइन बिछाने के दावों पर सवाल उठाते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि यदि 2023 में ही कार्य पूर्णता की ओर था, तो जनता को दूषित पानी क्यों मिला? रिपोर्ट के अनुसार 8 मरीज अब भी आईसीयू में हैं। हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शासन को अगली सुनवाई पर अधिक प्रामाणिक, स्पष्ट और वैज्ञानिक दस्तावेजों के साथ विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

विशेषज्ञ नजरिया : क्यों जरूरी है विसरा जांच और 34 मानकों पर परीक्षण?
– विसरा रिपोर्ट का महत्व : पोस्टमार्टम केवल बाहरी लक्षणों को दर्शाता है, जबकि विसरा (लीवर, किडनी के नमूने) की रासायनिक जांच से ही पानी में मौजूद बैक्टीरिया या जहरीले केमिकल (जैसे आर्सेनिक या ई-कोलाई) की पुष्टि होती है।
– 8 बनाम 34 मानक : निगम केवल 8 बुनियादी जांच करता है, जबकि औद्योगिक और घनी बस्ती में पानी की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए 34 मानकों (IS:10500) पर जांच अनिवार्य है। इसी जांच से पता चलता है कि पानी में सीवरेज का मल मिला है या नहीं।