अमरावती। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने शुक्रवार को महाराष्ट्र के दयार्पुर में न्यायालय की नव-निर्मित भव्य इमारत के उद्घाटन समारोह में शिरकत की। उन्होंने न्यायपालिका, प्रशासन और अधिवक्ता समुदाय को एक बेहद सख्त लेकिन मूल्यवान संदेश दिया।
चीफ जस्टिस गवई ने अपने संबोधन में कहा, यह कुर्सी जनता की सेवा के लिए है, न कि घमंड के लिए। कुर्सी अगर सिर में चढ़ जाए, तो यह सेवा नहीं, बल्कि पाप बन जाती है। उनका यह बयान न्यायपालिका और प्रशासनिक पदों पर बैठे हर व्यक्ति के लिए एक चेतावनी की तरह था।
सीजेआई गवई शुक्रवार को अपने गांव दारापुर पहुंचे, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्होंने अपने पिता, केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आर एस गवई के स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की और परिवार के कुछ सदस्यों के साथ उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया। इस अवसर पर गवई ने गांव के प्रवेशद्वार पर आरएस गवई स्मृति द्वार की आधारशिला भी रखी। इसके अलावा उन्होंने अमरावती जिले के दरियापुर में न्यायालय भवन का उद्घाटन किया। शनिवार को वे अमरावती जिला एवं सत्र न्यायालय में स्व. टीआर गिल्डा मेमोरियल ई-लाइब्रेरी का उद्घाटन करेंगे।
सीजेआई गवई ने अपने भाषण में रिटायरमेंट के बाद न्यायाधीशों को सरकारी पदों या राजनीतिक भूमिकाएं लेने पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा- अगर कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद सरकार में कोई अन्य पद ग्रहण कर लेता है या चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा देता है, तो इससे गंभीर नैतिक सवाल खड़े होते हैं। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो सकता है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि सेवानिवृत्ति के बाद की इन भूमिकाओं से यह धारणा बन सकती है कि न्यायिक फैसले भविष्य में मिलने वाली सरकारी नियुक्तियों या राजनीतिक फायदे को ध्यान में रखकर लिए गए थे। न्यायाधीश गवई ने यह भी साफ किया कि वे सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में प्रवेश नहीं करेंगे। उन्होंने कहा- उखक के पद पर रहने के बाद व्यक्ति को कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए। अगर कोई रिटायरमेंट के बाद सरकारी पद स्वीकार करता है या चुनाव लड़ता है, तो इससे लोगों का न्यायपालिका से भरोसा उठ सकता है।

