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ट्रंप ने बढ़ाया सीजफायर का समय, अपनी नाकामी छिपाने पाकिस्तान का लिया नाम

वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार तड़के ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच सीजफायर की अवधि आखिरी समय पर बढ़ा दी। यह फैसला उस वक्त लिया गया जब सीजफायर की समय सीमा खत्म होने वाली थी और खुद ट्रंप एक दिन पहले संकेत दे चुके थे कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से ईरान पर बमबारी शुरू कर सकता है। ऐसे में अचानक सीजफायर बढ़ाने का फैसला कई सवाल खड़े करता है। क्या यह रणनीतिक कदम है या फिर अमेरिका अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश कर रहा है?

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान की सरकार इस समय अंदर से बंटी हुई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और पीएम शहबाज शरीफ के अनुरोध पर अमेरिका ने हमला टाल दिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है, लेकिन फिलहाल ईरान को एक संयुक्त प्रस्ताव देने का समय दिया जा रहा है। हालांकि, इस दौरान ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रहेगी।

यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ अमेरिका सीजफायर की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान के समुद्री व्यापार को रोकने के लिए सख्त नाकेबंदी कर रखी है। अंतरराष्ट्रीय कानून के नजरिए से देखें तो किसी देश के बंदरगाहों की नाकेबंदी को युद्ध जैसी कार्रवाई माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में सीजफायर है या दबाव बनाने की रणनीति? अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने साफ कहा है कि ईरान के खार्ग आइलैंड पर तेल भंडारण जल्द ही भर जाएगा, जिससे ईरान को अपने तेल उत्पादन को रोकना पड़ सकता है।

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खार्ग आइलैंड ईरान के तेल निर्यात का प्रमुख केंद्र है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका सीधे तौर पर ईरान की अर्थव्यवस्था को निशाना बना रहा है। साथ ही अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी जहाज या व्यक्ति ईरान की मदद करेगा, उस पर सख्त प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ईरान ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकेर कालीबाफ के सलाहकार महदी मोहम्मदी ने ट्रंप के बयान को बेकार बताया और कहा इसका कोई मतलब नहीं है।

इस बीच कूटनीतिक मोर्चे पर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस का इस्लामाबाद दौरा रद्द कर दिया गया है। वह दूसरे दौर की वार्ता का नेतृत्व करने वहां जाने वाले थे। उनके साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और वरिष्ठ सलाहकार जेयर्ड कुशनर भी जाने वाले थे। दौरा रद्द होने से साफ होता है कि बातचीत की प्रक्रिया भी पूरी तरह स्थिर नहीं है।

जानकारों का मानना है कि ट्रंप की ओर से पाकिस्तान का नाम आगे करना एक तरह से रणनीतिक असमंजस को छिपाने की कोशिश है। असल में ट्रंप प्रशासन एक कठिन संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ वह ईरान पर अधिकतम दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ खुले युद्ध से भी बचना चाहता है। सीजफायर बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है, जहां बातचीत की गुंजाइश भी बनी रहे और दबाव भी कम न हो, लेकिन इस रणनीति में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि सीजफायर के बावजूद आक्रामक आर्थिक और समुद्री कदम जारी हैं। ईरान इसे साफ तौर पर उकसावे की कार्रवाई मान रहा है और उसने संकेत दिया है कि वह ऐसे दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। ईरान का दावा है कि उसे प्रतिबंधों से निपटना आता है और वह अपने हितों की रक्षा करना भी जानता है।