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पश्चिम एशिया संकट: पीएम मोदी ने बुलाई हाई-लेवल मीटिंग, गैस , ऊर्जा और सप्लाई चेन पर पैनी नजर

मकड़ाई एक्सप्रेस 24 नई दिल्ली। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक चिंताएं बढ़ा दी हैं। पश्चिम एशिया (वेस्ट एशिया) में युद्ध के गहराते बादलों के बीच भारत सरकार पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (रविवार) एक महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जिसमें इस भू-राजनीतिक संकट से भारत पर पड़ने वाले प्रभावों की व्यापक समीक्षा की जाएगी।

ऊर्जा सुरक्षा और निर्बाध आपूर्ति पर जोर

इस बैठक का प्राथमिक एजेंडा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों के लिए काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है। युद्ध की स्थिति में ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका को देखते हुए, पीएम मोदी मंत्रियों के साथ देशभर में कच्चे तेल, गैस और बिजली की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने के रोडमैप पर चर्चा करेंगे। सरकार का लक्ष्य है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का असर घरेलू कीमतों और वितरण व्यवस्था पर न पड़े।

स्थिर लॉजिस्टिक्स और आर्थिक स्थिरता

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प्रधानमंत्री की इस बैठक में केवल ऊर्जा ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स और व्यापारिक हितों पर भी मंथन होगा। वैश्विक तनाव के कारण समुद्री व्यापार मार्गों में रुकावट आने का खतरा है। ऐसे में सरकार प्रभावी वितरण व्यवस्था और स्थिर लॉजिस्टिक्स सुनिश्चित करने के लिए रणनीतियों पर विचार कर रही है। बैठक में उर्वरक (Fertilizer) क्षेत्र की स्थिति की भी समीक्षा की जाएगी, ताकि किसानों को खाद की आपूर्ति में कोई कमी न आए।

भारतीय नागरिकों की सुरक्षा प्राथमिकता

युद्ध के मैदान में बदलते हालात के बीच, पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। हाई-लेवल मीटिंग में आपातकालीन स्थितियों से निपटने और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर विदेश मंत्रालय के इनपुट्स पर भी चर्चा संभव है। सरकार का स्पष्ट विजन है कि किसी भी वैश्विक संकट के दौरान भारतीय नागरिकों और देश के आर्थिक हितों को सुरक्षित रखा जाए।

सक्रिय निगरानी और भविष्य की रणनीति

गौरतलब है कि भारत सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रही है। उपभोक्ताओं और उद्योगों के हितों की रक्षा के लिए पेट्रोलियम और बिजली मंत्रालय को पहले ही सतर्क रहने के निर्देश दिए जा चुके हैं। यह बैठक इस बात का संकेत है कि भारत सरकार भविष्य की चुनौतियों के लिए पहले से ही ‘प्लान-बी’ और वैकल्पिक विकल्पों पर सक्रियता से काम कर रही है।