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सोयाबीन संकट पर प्रशासन मौन: खेतों में बर्बाद हो रही सोयाबीन, किसानों की पुकार, कब सुनेगा प्रशासन?

सारंगपुर। सारंगपुर अंचल में इस बार सोयाबीन की फसल पर पीला मोजेक वायरस और इल्ली कीट का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। हजारों एकड़ में खड़ी फसल पीली पड़ने और पत्तियां मुरझाने लगी हैं। किसानों की मेहनत पर संकट मंडरा रहा है, लेकिन प्रशासन अब तक गहरी नींद में दिखाई दे रहा है। सारंगपुर अनुविभाग क्षेत्र के अकन्याखेड़ी, मगराना, मऊ, टिकोद, धामंदा, गायन, पट्टी, सुल्तानिया, उदनखेड़ी से लेकर सारंगपुर के आसपास बारोल और दुग्गया जैसे गांवों में हालात बेहद खराब हैं। खेतों में खडे किसान बेबसी से अपनी फसल सूखते देख रहे हैं। किसान शांतिलाल नागर एवं सचिन गुर्जर ने बताया कि हमने कर्ज लेकर बीज और खाद खरीदी थी, अब फसल बर्बाद हो रही है। सरकार सिर्फ कागजों पर राहत देती है, जमीनी स्तर पर कोई मदद नहीं मिल रही।

एक अन्य किसान महेश खाती ने गुस्से में कहा कृषि विभाग वाले बस सलाह देकर चले जाते हैं। दवाइयों के दाम इतने ज्यादा हैं कि छोटे किसान खरीद ही नहीं सकते। हम तो हाथ उठाकर आसमान से बारिश रुकने और भगवान से फसल बचाने की दुआ कर रहे हैं।-सहायक संचालक कृषि विभाग प्रहलाद सिंह ने माना कि यह बीमारी ज्यादा बारिश और सफेद मक्खी के कारण फैलती है। उन्होंने नीम तेल का छिडकाव या डाइमेथोएट, मेटासिस्टॉक्स और थायोमेथोक्साम जैसी दवाओं का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। लेकिन किसान सवाल कर रहे हैं कि क्या सरकार उन्हें यह दवा मुफ्त या सब्सिडी पर उपलब्ध कराएगी? हालांकि तहसीलदार आकाश शर्मा ने प्रभावित गांवों से रिपोर्ट तलब की है और कहा कि बीमा कंपनियों को सूचना देकर राहत दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। लेकिन किसान आशंकित हैं कि जब तक रिपोर्ट बनेगी और कागज दफ्तरों में घूमेंगे, तब तक फसल पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।

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क्या कहते है किसान
अगर फसल चली गई तो हम किसान परिवार कैसे पालेंगे? बच्चे स्कूल छोड देंगे, घर का चूल्हा तक बुझ जाएगा। प्रशासन अभी नहीं जागा तो आने वाले दिनों में किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाएंगे। फसल खराब हो रही है, इसका मुआवजा मिलना चाहिए।
शांतिलाल नागर, किसान।

सोयाबीन अंचल की मुख्य नकदी फसल है। इसकी बबार्दी न केवल किसानों बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगी। सवाल यही है कि क्या प्रशासन अब भी इंतजार करेगा या समय रहते ठोस कदम उठाएगा? क्योंकि अभी तक न तो जनप्रतिनिधि सुध ले रहे है और न ही अधिकारियों को परवाह है।
महेश खाती, किसान।