राखी सरोज:-
भारत में आजादी के जश्न में आज एक चीख सुनाई दे रही है। उन स्त्रियों की जिन्हें समाज की सोच अब भी बांधे रखतीं हैं। एक स्त्री जिसे आजाद देश में अपना जीवन जीने का हक नहीं है। स्त्री रूप में जन्म लेना यानी प्रथा, संस्कृति, मान-सम्मान सबका बोझ उठाने वह कंधे, जिन्हें अपनी रक्षा के लिए किसी पुरुष की आवश्यकता होती है। यदि स्त्री अपनी रक्षा करने की ताकत नहीं रखतीं हैं, तो वह कैसे आप की संस्कृति, मान-सम्मान की रक्षा कर सकतीं है। स्त्री जिसका जीवन का आधार उसका परिवार और उनकी खुशी होती है। वहीं परिवार जहां उसके लिए कोई जगह नहीं होती है। कभी पिता के घर, कभी पति के घर आसरा पातीं है। असल गुलाम तो हम स्त्रियां है। जिन्हें 21वीं सदी में भी गए गुज़रे नियमों का गुलाम बनाया जाता है। देश को आजादी मिले एक ओर साल बीत गया। तब सोचती हूं ,हम स्त्रियों को आजादी कब मिलेगी। उन विचारों से जिसका ग़ुलाम बना कर हमें डिजिटल दुनिया में भी गुलाम बना रखा है। हमारे पैरों में पड़ी बेड़ियां जाने कब टूटेगी, कितना संघर्ष स्त्रियों को एक सामान्य जीवन जीने के लिए करना होगा।

