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भगवान परशुराम जन्मोत्सव: धर्म की रक्षा के लिए अवतरित छठे अवतार की कथा !!

अधर्म से त्रस्त धरती और ऋषि जमदग्नि का तप
त्रेतायुग का समय था। धरती पर हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन और अन्य क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बढ़ गया था। वे अपनी शक्ति के अहंकार में ऋषि-मुनियों को सताने लगे। गौ, ब्राह्मण और धर्म की मर्यादा टूटने लगी। ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका नर्मदा तट पर कठोर तप कर रहे थे। उनका संकल्प था कि धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु को अवतार लेना होगा। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वर दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

वैशाख शुक्ल तृतीया: अक्षय तिथि पर जन्म
वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया भी कहते हैं, उस पावन दिन भृगुकुल में भगवान परशुराम का जन्म हुआ। जन्म लेते ही बालक के तेज से पूरा आश्रम आलोकित हो उठा। उनके कंधे पर जन्म से ही यज्ञोपवीत था और हाथ में छोटे फरसे का चिन्ह था। इसलिए उनका नाम राम रखा गया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें अपना परशु यानी फरसा दिया, जिसके बाद वे परशुराम कहलाए।

गुरु शिव से शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा
बालक राम ने बचपन से ही शास्त्रों के साथ शस्त्र विद्या में भी निपुणता पाई। कैलाश जाकर उन्होंने भगवान शिव को गुरु बनाया। शिव ने उन्हें युद्ध कला, धनुर्विद्या और दिव्य अस्त्रों का ज्ञान दिया। साथ ही माता पार्वती ने उन्हें क्षत्रियों के अहंकार को नष्ट कर धर्म स्थापना का आदेश दिया। परशुराम ने गुरु दक्षिणा में आजीवन धर्म की रक्षा का व्रत लिया।

कामधेनु गौ और कार्तवीर्य का वध 
एक दिन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सेना सहित जमदग्नि ऋषि के आश्रम पहुंचा। ऋषि ने कामधेनु गौ की सहायता से सबका सत्कार किया। राजा के मन में लालच आ गया। उसने बलपूर्वक कामधेनु को छीनने का प्रयास किया। विरोध करने पर राजा ने जमदग्नि ऋषि की हत्या कर दी। जब परशुराम आश्रम लौटे तो पिता का कटा सिर देखकर उनका रोष जाग उठा। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे धरती को 21 बार अहंकारी क्षत्रियों से विहीन करेंगे।

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धर्म की स्थापना और चिरंजीवी वरदान।
परशुराम ने अकेले ही कार्तवीर्य अर्जुन और उसकी सेना का नाश किया। इसके बाद उन्होंने पूरे आर्यावर्त में घूमकर अधर्मी राजाओं का अंत किया। मान्यता है कि उन्होंने 21 बार पृथ्वी से अत्याचारी क्षत्रियों का संहार कर उनका रक्त समंतपंचक के पांच सरोवरों में भर दिया। कार्य पूर्ण होने पर पितरों के आदेश से उन्होंने शस्त्र त्याग दिए और महेंद्र पर्वत पर तप करने चले गए।

जन्मोत्सव का महत्व
आज भी अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन ब्राह्मण समाज शोभायात्रा निकालता है। परशुराम जी को चिरंजीवी माना गया है। कहते हैं कि वे कल्कि अवतार के गुरु बनेंगे। उनका जीवन संदेश देता है कि शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान तभी सार्थक है जब वह धर्म और न्याय की रक्षा के लिए उठे। क्रोध पर नियंत्रण, माता पिता की भक्ति और अन्याय के खिलाफ खड़े होना ही परशुराम तत्व है।

अधर्म का सख्त विरोध करना जरुरी है।

भगवान परशुराम का अवतरण यह सिखाता है कि जब समाज में अधर्म बढ़ता है तो ईश्वर किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं। उनका फरसा केवल हिंसा का प्रतीक नहीं, बल्कि अन्याय को काटने वाले विवेक का प्रतीक है।भगवान परशुराम ने अन्याय अहंकार और अधर्म का सख्ती से विरोध किया तो दूसरी वनवासी बच्चो को ठंड से कांपता देख अपनी ही कुटिया में लगा दी।