मकडा़ई एक्सप्रेस 24 हरदा । वीर वीरांगनाओ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और रानी दुर्गावती का नाम विशेष आदर और सम्मान से लिया जाता है। आज हम रानी दुर्गावती के बारें जानते है। रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था। इसी कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। वह उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के कालिंजर किले के चंदेल राजा कीरत सिंह चंदेल की इकलौती संतान थीं। चंदेल वंश वही है जिसने खजुराहो के मंदिर बनवाए थे। बचपन से ही दुर्गावती को घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी का शौक था। कहा जाता है कि जंगल में शेर दिखने की खबर मिलते ही वह बिना पानी पिए उसका शिकार करके ही लौटती थीं।
गोंडवाना की महारानी कैसे बनीं
1542 में 18 साल की उम्र में उनका विवाह गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह के बड़े पुत्र दलपत शाह से हुआ। गढ़-कटंगा यानी गोंडवाना उस समय बहुत समृद्ध राज्य था, जिसका केंद्र आज का जबलपुर था। विवाह के 4 साल बाद ही दलपत शाह का निधन हो गया। उस समय उनके पुत्र वीर नारायण सिर्फ 3 साल के थे। ऐसे में रानी दुर्गावती ने खुद शासन की बागडोर संभाली।
16 साल का स्वर्णिम शासन
रानी दुर्गावती ने करीब 16 साल तक गोंडवाना पर शासन किया और इसे गोंडवाना के उत्कर्ष का काल कहा जाता है।
– उन्होंने राजधानी को सिंगौरगढ़ से चौरागढ़ बनाया।
– दीवान आधार सिंह और मंत्री मान ठाकुर की मदद से उन्होंने एक सुसज्जित सेना तैयार की।
– उन्होंने स्थानीय संसाधनों पर आधारित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनाई। कृषि के साथ-साथ चिरौंजी, महुआ, लाख, शहद, गोंद और इमारती लकड़ी जैसे वनोपज को व्यापार से जोड़ा। महिलाओं के लिए लाख के आभूषण जैसे कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया।
– अबुल फजल ने अपनी किताब आइने-अकबरी में गढ़-कटंगा की समृद्धि और सुव्यवस्थित कर प्रणाली का जिक्र किया है।
– सबसे बड़ी देन उनका जल प्रबंधन था। उन्होंने जबलपुर और मंडला में 500 से ज्यादा तालाब बनवाए। रानीताल, हनुमानताल, चेरीताल आज भी उनके नाम पर हैं।
अंतिम सांस तक मुगलों से युद्ध
1556 में मालवा के सुल्तान बाज बहादुर ने गोंडवाना पर हमला किया, पर रानी ने उसे बुरी तरह हराया। 1562 में अकबर ने मालवा पर कब्जा कर लिया और उसके सेनापति आसफ खान को गोंडवाना जीतने भेजा।
पहली बार आसफ खान को हार का मुंह देखना पड़ा। 24 जून 1564 को आसफ खान ने तोपखाने के साथ दूसरा बड़ा हमला किया। रानी दुर्गावती हाथी पर सवार होकर खुद युद्ध में उतरीं, उनका बेटा वीर नारायण भी साथ था। नर्रई नाले के पास हुए भीषण युद्ध में रानी को दो तीर लगे।
घायल होने के बाद जब उन्हें लगा कि वह मुगलों के हाथ लग जाएंगी, तो उन्होंने अपने सैनिक से कहा कि वह उन्हें मार दे। सैनिक के मना करने पर उन्होंने खुद ही अपनी कटार सीने में भोंककर आत्म-बलिदान दे दिया। वह दिन आज भी 24 जून को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
आज क्यों प्रासंगिक हैं
रानी दुर्गावती सिर्फ एक योद्धा नहीं, एक दूरदर्शी प्रशासक थीं। उनका जल संरक्षण मॉडल आज मध्यप्रदेश के लिए सीख है। भारत सरकार ने 1988 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया, जबलपुर में उनका नाम विश्वविद्यालय और संग्रहालय को दिया गया है। गोंड समाज आज भी उन्हें देवी मानकर पूजता है।

