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हरदा : सेवा, साधना और स्वावलंबन की जीवंत परंपरा — राधास्वामी सत्संग दयालबाग

हरदा। आध्यात्मिकता जब केवल उपदेश तक सीमित न रहकर जीवन-पद्धति बन जाती है, तब वह समाज में स्थायी परिवर्तन का आधार बनती है। राधास्वामी सत्संग दयालबाग इसी जीवन-दर्शन का सशक्त उदाहरण है। दयालबाग, आगरा से संचालित यह संस्था वर्षों से साधना, सेवा और स्वावलंबन को एक साथ लेकर चल रही है। यहाँ भक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि श्रम और अनुशासन के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।

राधास्वामी सत्संग का मूल स्वर आत्मिक उन्नति है, परंतु यह उन्नति समाज से अलग होकर नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर, कर्मयोग के माध्यम से प्राप्त की जाती है। “काम ही सेवा है” का सिद्धांत यहाँ केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार है। यही कारण है कि दयालबाग में संचालित कुटीर उद्योग इकाइयाँ लाभ कमाने की दृष्टि से नहीं, बल्कि सेवा और आत्मनिर्भरता की भावना से कार्य करती हैं।

हैंडलूम वस्त्रों से लेकर आयुर्वेदिक उत्पादों तक, अगरबत्ती से लेकर कैनवास बैग तक—इन उत्पादों के पीछे केवल श्रम नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा की भावना जुड़ी होती है। इनका निर्माण करने वाले स्वयंसेवक अनुशासित जीवनशैली अपनाते हुए साधना और श्रम को एक साथ साधते हैं। उनके लिए उत्पादन एक व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है।

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हरदा जिले में भी राधास्वामी सत्संग की राजाबरारी शाखा इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है। यहाँ नियमित सत्संग, आध्यात्मिक प्रवचन और सामुदायिक सेवा कार्यक्रमों के माध्यम से नैतिक जीवन और संयम का संदेश दिया जाता है। समय-समय पर स्वदेशी उत्पाद प्रदर्शनी का आयोजन कर स्थानीय नागरिकों को आत्मनिर्भरता और स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

28 फरवरी को गुर्जर मंगल भवन, हरदा में आयोजित स्वदेशी उत्पाद प्रदर्शनी ने जिले में उत्साह का वातावरण निर्मित किया। बड़ी संख्या में नागरिकों ने भाग लेकर न केवल उत्पादों का अवलोकन किया, बल्कि सेवा और स्वावलंबन के इस अनूठे मॉडल को समझने का प्रयास भी किया। यह आयोजन केवल विक्रय नहीं, बल्कि एक विचार का प्रसार था—कि आध्यात्मिकता और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं।

राधास्वामी सत्संग दयालबाग का कार्य यह सिद्ध करता है कि यदि साधना में सेवा और सेवा में श्रम जुड़ जाए, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन स्वाभाविक रूप से संभव है। हरदा में इसकी सक्रियता इसी विचारधारा की सजीव अभिव्यक्ति है।