( कैलाश सेजकर)
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 दिल्ली।जनवरी 2026 की मौजूदा भू-राजनीतिक स्थितियों को देखते हुए, यदि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष होता है, तो भारतीय बाज़ार पर इसके गहरे और बहुआयामी प्रभाव पड़ सकते हैं। हाल ही में अमेरिकी प्रशासन द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा ने पहले ही बाज़ार में हलचल पैदा कर दी है। फिर भी हम भारतीय बाज़ार पर होने वाले संभावित प्रभाव कुछ चर्चा करते है क्या क्या संभावनाए हो सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है। ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होगी, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतें काफी बढ़ सकती हैं।तेल महंगा होने से माल ढुलाई (logistics) की लागत बढ़ेगी, जिससे खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के सामान के दाम बढ़ सकते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में प्रत्येक $10 प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा (CAD) काफी बढ़ जाता है।
शेयर बाज़ार में अस्थिरता
युद्ध की आहट मात्र से ही शेयर बाज़ार में “पैनिक सेलिंग” (घबराहट में बिक्री) शुरू हो सकती है। पेंट, टायर, एयरलाइंस और लुब्रिकेंट कंपनियों के शेयरों में गिरावट आ सकती है क्योंकि कच्चा तेल इनका मुख्य कच्चा माल है।
दूसरी ओर, ONGC और ऑयल इंडिया जैसी घरेलू तेल उत्पादक कंपनियों को ऊंची कीमतों का फायदा मिल सकता है। साथ ही, निवेशक जोखिम कम करने के लिए शेयर बाज़ार से पैसा निकालकर सोने (Gold) में निवेश कर सकते हैं, जिससे सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच सकती हैं।
अमेरिकी टैरिफ और निर्यात पर संकट
जनवरी 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप की नई नीतियों के अनुसार, ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अमेरिका ने 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश दिया है।
भारत के कपड़ा, रत्न एवं आभूषण, और ऑटो घटकों जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर इसका बुरा असर पड़ सकता है। भारत का अमेरिका को होने वाला निर्यात महंगा हो जाएगा, जिससे वैश्विक बाज़ार में भारतीय सामान की प्रतिस्पर्धात्मकता कम होगी।
भारत के कृषि उत्पाद पर सीधा असर
ईरान भारतीय बासमती चावल और चाय का बड़ा खरीदार है। युद्ध और प्रतिबंधों के कारण इन वस्तुओं के निर्यात में भारी कमी आ सकती है, जिससे घरेलू स्तर पर इनकी कीमतों में गिरावट और किसानों को नुकसान हो सकता है।
भारतीय रुपया और विदेशी निवेश
रुपये की कमजोरी हो सकती है। कच्चे तेल के बढ़ते बिल और डॉलर की मजबूती के कारण भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है।
अनिश्चितता के माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाज़ार से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित बाज़ारों (जैसे अमेरिका) की ओर रुख कर सकते हैं।
रणनीतिक प्रभाव: चाबहार बंदरगाह
ईरान में भारत का महत्वपूर्ण निवेश चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट पर है। युद्ध की स्थिति में इस रणनीतिक प्रोजेक्ट का काम रुक सकता है, जो भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुँचने का प्रमुख मार्ग है।
अमेरिका-ईरान संघर्ष भारत के लिए एक “मैक्रो-इकोनॉमिक शॉक” की तरह होगा। हालांकि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतें और अमेरिकी टैरिफ की मार भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर (GDP Growth) को धीमा कर सकती है।

