दशहरे से शरद पूर्णिमा तक बच्चे मांग रहे दान, लुप्त होती परंपरा को बचाए हुए हैं
केके यदुवंशी पत्रकार
सिवनी मालवा। नगर में दशहरा पर्व से ही टेसू और घरवा के पारंपरिक गीत गूंजने लगे हैं। छोटे-छोटे बच्चों की टोलियां _मेरा टेसू यही खड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा_ और छोटी बालिकाएं _सिंगाजी घरवा गाजो जी माय थारे घर मुरली बाजे_ जैसे गीत गाते हुए घर-घर जाकर दान मांग रही हैं।बच्चे फूंस और लकड़ियों से तिकोना टेसू बनाकर उसे पन्नियों से सजाते हैं, उसके अंदर दिया और आटे से बना पुतला रखते हैं।
_टेसू अच्छा होता तो बहू लाते.जैसे गीत गाकर गेहूं, चावल, दाल और नगदी के रूप में छल्ला-बोली का दान लेते हैं। वहीं बालिकाएं मिट्टी के घड़े में चारों तरफ छेद कर उसमें दीपक रखकर घरवा बनाती हैं।यह उत्सव दशहरे से शरद पूर्णिमा तक मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा पर टेसू को लाठियों से पीटकर जलाया जाता है और घरवा को नदी में विसर्जित किया जाता है। इसके बाद मिली दान राशि से बच्चे दाल-बाटी, चूरमा बनाकर सामूहिक भोज करते हैं।
ब्रज, बुंदेलखंड और ग्वालियर में प्रसिद्ध यह परंपरा अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है, लेकिन सिवनी मालवा में बच्चों ने आज भी इसे जीवित रखा हुआ है।

