नर्मदापुरम में रहने वाले भी अनजान है अभी प्राचीन विरासत से ,पढ़िए एक अद्भुत सार लेख
मकडा़ई एक्सप्रेस 24 नर्मदापुरम । आज हम आपको एक ऐसे शहर की ऐतिहासिक धार्मिक जानकारी देगे जो मध्य भारत का मुख्य केंद्र बिंदु रहा अंग्रेजो ने यहां से अपनी प्रशासन व्यवस्था मजबूत बनाया। जिसे पहले होशंगाबाद कहा जाता था।
नर्मदापुरम का संक्षिप्त परिचय
मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम संभाग का मुख्यालय है। यह शहर नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है और धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2021 में इसका नाम बदलकर नर्मदापुरम कर दिया गया, जो नर्मदा नदी से जुड़ी इसकी पहचान को दर्शाता है। शहर का इतिहास गोंड, कलचुरि, गोंडवाना, मुगल और मराठा शासन से जुड़ा हुआ है, और यह प्राचीन काल से ही तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध रहा है। नर्मदा नदी के किनारे बसा होने के कारण यह स्थान प्रकृति और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
धार्मिक महत्व: नर्मदा नदी की पवित्रता
हिंदू धर्म में नर्मदा नदी को गंगा, यमुना और गोदावरी के समान पवित्र माना गया है। स्कंद पुराण, वायु पुराण और मत्स्य पुराण में नर्मदा की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। मान्यता है कि नर्मदा का जल बिना मंत्रोच्चारण के भी पवित्र हो जाता है, इसलिए इसे “स्वयं पवित्रा” कहा जाता है। नर्मदा को शिव की पुत्री भी माना जाता है और कहा जाता है कि इसके दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।
नर्मदापुरम में नर्मदा नदी के किनारे स्थित सेठानी घाट सबसे प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहाँ हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु स्नान, तर्पण और पूजा करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति और नर्मदा जयंती पर यहाँ विशाल मेला लगता है।
सेठानी घाट के पास स्थित *सेठानी महल* 19वीं सदी में बना एक ऐतिहासिक स्मारक है, जो अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा सिद्धबाबा मंदिर, चौबीस अवतार मंदिर, जैन मंदिर* और होशंगशाह का मकबरा भी धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं। नर्मदा परिक्रमा करने वाले यात्री नर्मदापुरम को अपनी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हैं।
प्राचीन इतिहास: गोंड वंश से लेकर गोंडवाना साम्राज्य तक
नर्मदापुरम का इतिहास लगभग 2000 साल पुराना है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र गोंड जनजाति के अधीन था। 4थी-5वीं शताब्दी में यह गुप्त साम्राज्य का हिस्सा बना। इसके बाद 10वीं-12वीं शताब्दी में कलचुरि वंश ने इस क्षेत्र पर शासन किया। कलचुरियों ने नर्मदा के किनारे कई मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें से कुछ के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। कलचुरि काल में नर्मदापुरम व्यापार और कला का प्रमुख केंद्र बन गया था।
13वीं शताब्दी में गोंड राजा संग्राम शाह ने गोंडवाना साम्राज्य की स्थापना की और नर्मदापुरम को अपनी राजधानी बनाया। गोंड शासकों ने यहाँ कई किले, महल और जलाशय बनवाए। गोंडवाना साम्राज्य की संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था आज भी स्थानीय लोककथाओं और परंपराओं में जीवित है।
15वीं शताब्दी में मालवा के सुल्तान होशंग शाह ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और शहर का नाम अपने नाम पर “होशंगाबाद” रख दिया। होशंग शाह का मकबरा आज भी नर्मदापुरम का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक है, जो अपनी अद्भुत वास्तुकला और संगमरमरी नक्काशी के लिए जाना जाता है।
मुगल और मराठा काल: रणनीतिक महत्व
16वीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर ने नर्मदापुरम को अपने साम्राज्य में मिला लिया। मुगल काल में यह क्षेत्र मालवा सूबे का हिस्सा बना और व्यापारिक व सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। मुगलों ने यहाँ कई मस्जिदें और प्रशासनिक भवन बनवाए, जिनमें से कुछ आज भी खंडहरों के रूप में मौजूद हैं। मुगल शासन के दौरान नर्मदापुरम कृषि और व्यापार का केंद्र बना रहा।
17वीं शताब्दी में मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम ने नर्मदापुरम पर आक्रमण कर इसे मराठा साम्राज्य में शामिल कर लिया। मराठा शासन के दौरान नर्मदापुरम व्यापार और कृषि का प्रमुख केंद्र बना। पेशवा रघुनाथ राव ने यहाँ कई मंदिरों और घाटों का निर्माण कराया। 1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया और 1867 में इसे एक जिला घोषित किया गया। ब्रिटिश काल में नर्मदापुरम रेलवे जंक्शन के रूप में विकसित हुआ और व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ीं।
स्वतंत्रता संग्राम में नर्मदापुरम का योगदान
ब्रिटिश काल में नर्मदापुरम स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। स्थानीय गोंड और अन्य आदिवासी समुदायों ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष में भाग लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी नर्मदापुरम के नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी ने 1921 में नर्मदापुरम का दौरा किया था और यहाँ खादी आंदोलन को बढ़ावा दिया था। कई स्थानीय नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जेल यातनाएँ सहीं।
पुरात्विक महत्व: प्राचीन अवशेष और गुफाएँ
नर्मदापुरम के आसपास कई प्राचीन पुरात्विक स्थल स्थित हैं। भीमबेटका गुफाएँ, जो UNESCO विश्व धरोहर स्थल हैं, नर्मदापुरम से लगभग 45 किमी दूर स्थित हैं। यहाँ 30,000 साल पुराने शैलचित्र मिले हैं, जो मानव सभ्यता के प्रारंभिक इतिहास को दर्शाते हैं। इन चित्रों में शिकार, नृत्य और दैनिक जीवन के दृश्य अंकित हैं।
आदमगढ़ पहाड़ी पर भी प्राचीन शैलचित्र और मध्यपाषाण युग के अवशेष मिले हैं। यहाँ खुदाई में पाषाण युग के औजार, मिट्टी के बर्तन और हड्डियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो बताते हैं कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से मानव बस्ती रहा है। इसके अलावा *पचमढ़ी* की गुफाएँ भी प्राचीन काल से धार्मिक और ध्यान का केंद्र रही हैं। इन गुफाओं में बौद्ध और जैन धर्म से जुड़े अवशेष भी मिले हैं।
नर्मदा परिक्रमा और धार्मिक परंपराएँ नर्मदा महोत्सव
नर्मदा परिक्रमा हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है। श्रद्धालु नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक से शुरू होकर नर्मदा के दोनों किनारों पर पैदल परिक्रमा करते हुए लगभग 2600 किमी की यात्रा पूरी करते हैं। नर्मदापुरम इस परिक्रमा का एक प्रमुख पड़ाव है। यहाँ परिक्रमावासी रुककर विश्राम करते हैं और नर्मदा की पूजा करते हैं। परिक्रमा के दौरान साधु-संत और सामान्य श्रद्धालु नर्मदा के किनारे-किनारे चलते हुए ध्यान और तप करते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा पर नर्मदापुरम में *नर्मदा महोत्सव* मनाया जाता है। इस दौरान नदी के किनारे दीपदान किया जाता है और पूरे शहर को दीपों से सजाया जाता है। यह दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है और हजारों श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं। मकर संक्रांति पर भी यहाँ स्नान और दान का विशेष महत्व है। नर्मदा जयंती पर भव्य पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
सांस्कृतिक विरासत: लोक कला और परंपराएँ
नर्मदापुरम की संस्कृति गोंड, कोल और बैगा जनजातियों के प्रभाव से समृद्ध है। यहाँ गोंड चित्रकला, धुरिया नृत्य और लोकगीत आज भी जीवित हैं। गोंड चित्रकला में प्रकृति, पशु-पक्षी और पौराणिक कथाओं को रंगों के माध्यम से दर्शाया जाता है। धुरिया नृत्य आदिवासी समुदायों का पारंपरिक नृत्य है जो त्योहारों और मेलों में प्रस्तुत किया जाता है।
स्थानीय व्यंजनों में दाल बाफले, दाल पानिया, मालपुआ और जलेबी प्रसिद्ध हैं। नर्मदा की मछली भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। नर्मदापुरम के मेले और त्योहार स्थानीय संस्कृति को दर्शाते हैं। यहाँ के लोग आज भी अपनी पारंपरिक वेशभूषा और भाषा को संरक्षित रखे हुए हैं।
धार्मिक स्थल और मंदिर
नर्मदापुरम में कई प्राचीन और आधुनिक मंदिर स्थित हैं। सिद्धबाबा मंदिर नर्मदा तट पर स्थित एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। मान्यता है कि यहाँ सिद्ध बाबा ने तपस्या की थी। चौबीस अवतार मंदिर भगवान विष्णु के 24 अवतारों को समर्पित है और इसकी वास्तुकला अद्भुत है। जैन मंदिर में जैन तीर्थंकरों की प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं।
होशंगशाह का मकबरा – एक ऐतिहासिक स्मारक है जो 15वीं शताब्दी में बना था। यह सफेद संगमरमर से बना है और इसकी वास्तुकला ताजमहल से प्रेरणा लेने वाली मानी जाती है। इसके अलावा *गांधी भवन* और *स्वराज भवन* भी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े महत्वपूर्ण स्थल हैं।
आधुनिक विकास और धार्मिक पर्यटन
आज नर्मदापुरम न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि एक विकसित कृषि और औद्योगिक केंद्र भी बन चुका है। नर्मदा घाटी विकास परियोजना के तहत यहाँ सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए कई बांध बनाए गए हैं। तवा बांध और बरगी बांध नर्मदापुरम क्षेत्र के प्रमुख जलाशय हैं जो कृषि और पर्यटन दोनों को बढ़ावा देते हैं।
धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने सेठानी घाट का सौंदर्यीकरण किया है और यहाँ लाइट एंड साउंड शो की व्यवस्था की है। नर्मदापुरम को “नर्मदा नगरी” के रूप में विकसित करने के लिए कई योजनाएँ चल रही हैं। नर्मदा तट पर घाटों का निर्माण और सफाई अभियान चलाया जा रहा है ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिल सके।
धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर का संगम
नर्मदापुरम एक ऐसा शहर है जहाँ प्रकृति, धर्म और इतिहास का अनूठा संगम देखने को मिलता है। नर्मदा नदी की पवित्रता, प्राचीन मंदिरों की शांतिमा, और गोंडवाना साम्राज्य की ऐतिहासिक गाथाएँ इसे मध्यप्रदेश का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बनाती हैं। यहाँ की धरती पर गोंड, कलचुरि, मुगल और मराठा शासकों की संस्कृति के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।
आज भी नर्मदापुरम के लोग अपनी परंपराओं और संस्कृति को सहेजकर रखे हुए हैं। चाहे वह नर्मदा की आरती हो, भीमबेटका के शैलचित्र हों, या होशंग शाह का मकबरा — हर एक स्थल नर्मदापुरम की गौरवशाली विरासत की कहानी कहता है। यही कारण है कि नर्मदापुरम को “नर्मदा की नगरी” कहा जाता है और यह श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों दोनों के लिए एक अनमोल स्थल है। नर्मदा नदी की कल-कल ध्वनि और प्राचीन मंदिरों की घंटियाँ मिलकर नर्मदापुरम को एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती हैं।

