मकड़ाई एक्सप्रेस 24विशेष । शिक्षा केवल किताबी ज्ञान का नाम नहीं है, बल्कि यह वह संस्कार है जो एक व्यक्ति को समाज में रहने योग्य बनाता है। प्राचीन भारत में ‘गुरु’ का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया था, लेकिन आज के आधुनिक स्कूलों में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत होती जा रही है। अनुशासन की जगह अब अहंकार और धमकियों ने ले ली है।
किशोरावस्था: जोश और अनुशासनहीनता का टकराव
किशोरावस्था जीवन का वह पड़ाव है जहाँ शारीरिक और मानसिक बदलावों के कारण विद्यार्थियों में स्वभाविक रूप से चिड़चिड़ापन या विद्रोही भावना होती है। परंतु, आज के दौर में यह विद्रोह ‘बदतमीजी’ की सीमा लांघ रहा है।
सामान्य सी टोक-टाक पर शिक्षक से बहस करना, कक्षा में अभद्र भाषा का प्रयोग करना और शिक्षक के आदेशों की अवहेलना करना आम बात हो गई है। जब शिक्षक सुधार के लिए कोई कदम उठाते हैं, तो उन्हें सम्मान के बजाय विरोध का सामना करना पड़ता है।
आर्थिक संपन्नता और राजनीतिक रसूख का नकारात्मक प्रभाव
आजकल शिक्षा एक ‘सेवा’ के बजाय ‘व्यापार’ बनती जा रही है। संपन्न परिवारों के बच्चे अक्सर इस अहंकार में रहते हैं कि वे भारी-भरकम फीस देकर स्कूल और शिक्षकों को ‘खरीद’ रहे हैं। इसके अलावा, माता-पिता का राजनीतिक रसूख आग में घी डालने का काम करता है।
प्रभावशाली परिवारों के बच्चे शिक्षकों को अपनी जागीर समझने लगते हैं।उन पर अनावश्यक दबाब बनाने की कोशिश करते है।
क ई बार शिक्षक द्वारा किसी गलती डांटने पर “बाहर देख लेने” या “नौकरी से निकलवा देने” जैसी धमकियां दी जाती जो कभी केवल फिल्मों मे नजर आती थी ,बल्कि स्कूलों के गलियारों की कड़वी सच्चाई बन चुकी हैं।
अभिभावकों का बदलता रवैया: सुधार में सबसे बड़ी बाधा
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अभिभावक अपने बच्चे की गलती सुधारने के बजाय शिक्षक को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। यदि शिक्षक बच्चे को उसकी किसी गलत हरकत पर डांटता है, तो माता-पिता इसे ‘बच्चे का मानसिक उत्पीड़न’ करार देकर स्कूल पहुंच जाते हैं।
जब माता-पिता शिक्षक पर दबाव बनाते हैं कि वह उनके बच्चे से माफी मांगे, तो यह न केवल उस शिक्षक का अपमान है, बल्कि शिक्षा की पूरी गरिमा का हनन है।
यदि एक शिक्षक को अनुचित रूप से झुकना पड़े या माफी मांगनी पड़े, तो वह उस स्कूल में आत्मसम्मान के साथ कभी नहीं पढ़ा पाएगा। उसकी नैतिकता टूट जाती है और वह भविष्य में किसी भी छात्र को टोकने से डरने लगता है, जिससे अंततः छात्र का ही नुकसान होता है।
शिक्षक की सुरक्षा और आत्मसम्मान का प्रश्न
आज के माहौल में शिक्षक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कई मामलों में तो विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों पर शारीरिक हमले की खबरें भी सामने आती हैं।
जब समाज और कानून केवल छात्र के अधिकारों की बात करते हैं और शिक्षक के सम्मान को भूल जाते हैं, तो शिक्षण की गुणवत्ता गिरना निश्चित है। एक डरा हुआ शिक्षक कभी भी एक बेहतर पीढ़ी का निर्माण नहीं कर सकता।
इन मामलो का समाधान
इस समस्या का समाधान केवल कड़े नियमों में नहीं, बल्कि परवरिश में है। विद्यार्थियो के माता-पिता को समझना होगा कि शिक्षक उनके बच्चे का दुश्मन नहीं, मार्गदर्शक है।
इसके अलावा स्कूल मैनेजमेंट को केवल मुनाफे पर ध्यान न देकर शिक्षकों के आत्मसम्मान की रक्षा करनी चाहिए। बदतमीजी या शारीरिक हिंसा करने वाले छात्रों के खिलाफ स्कूल को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, चाहे वह कितना ही रसूखदार क्यों न हो।
अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी सभ्य बने, तो हमें शिक्षक को फिर से वही ‘गुरु’ का दर्जा और भयमुक्त वातावरण देना होगा, जिसका वह हकदार है।

