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खरी खरी जय स्तंभ चौक से… व्यापारियों की पीड़ा कांग्रेस की राजनीति?—नगर पालिका विवाद में दिखा सियासी स्वार्थ का खेल

केके यदुवंशी 

सिवनी मालवा। नगर पालिका में अवैध वसूली, अतिक्रमण कार्रवाई और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस का उग्र तेवर पहली नजर में जनहित की लड़ाई लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह संघर्ष कम और सियासी अवसर ज्यादा प्रतीत होता है। व्यापारियों की वास्तविक परेशानी से अधिक, कांग्रेस को इस विवाद में राजनीतिक जमीन तलाशते देखा जा रहा है।

नगर पालिका के कर्मचारी के अभद्र व्यवहार और अवैध वसूली के आरोप गंभीर हैं, लेकिन कांग्रेस नेताओं की भाषा और तेवर समस्या के समाधान से ज्यादा टकराव और राजनीतिक संदेश पर केंद्रित नजर आते हैं। ज्ञापन, चेतावनी, आंदोलन की धमकी और “ईंट से ईंट बजा देंगे” जैसे बयान सवाल खड़े करते हैं कि उद्देश्य व्यवस्था सुधारना है या सत्ता पर दबाव बनाकर राजनीतिक लाभ उठाना।

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अंडरग्राउंड पार्किंग से निकली मिट्टी, जयस्तंभ चौक की भूमि, ठेकेदार को कथित लाभ और अतिक्रमण कार्रवाई—ये सभी मुद्दे निश्चित रूप से जांच योग्य हैं। मगर कांग्रेस की रणनीति इन विषयों को प्रशासनिक सुधार के बजाय राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती दिख रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस व्यापारियों की समस्या को लेकर पहले भी उतनी ही सक्रिय थी, या यह सक्रियता आगामी राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा है? क्या यह जनहित की लड़ाई है, या नगर की अव्यवस्थाओं को भुनाकर सियासी बढ़त लेने की कोशिश?

इस पूरे घटनाक्रम में व्यापारी कहीं पीछे छूटते नजर आते हैं और राजनीति आगे निकल जाती है। जनता की परेशानी पर राजनीति का चश्मा चढ़ना लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय है—क्योंकि जब मुद्दे समाधान की जगह सियासत का मंच बन जाएं, तो असली पीड़ित सिर्फ जनता ही होती है।