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ये है त्रियुगीनारायण मंदिर जहां हुआ था…….शिव पार्वती का शुभ विवाह

भगवान शिव पार्वती विवाह का पर्व महाशिवरात्रि  इस साल 18 फरवरी को है, धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माता पार्वती के पिता पर्वतराज हिमवान का महल उत्तराखंड में था, जहां इनका विवाह हुआ था। मान्यता है कि यहां के एक कुंड में  जहां शिव पार्वती ने फेरे लिए थे, वहां आज भी दिव्य लौ जलती रहती है।

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त्रियुगीनारायण मंदिरः उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में त्रियुगीनारायण गांव में एक मंदिर है। मान्यता है कि भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भूदेवी इस मंदिर में विराजमान है। वहीं इस मंदिर में माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह के दौरान जिस अग्निकुंड के फेरे लिए गए थे, उसमें एक दिव्य लौ जलती रहती है।
ये है पूरी कहानीः धार्मिक ग्रंथों के अनुसार पर्वतराज हिमालय के घर आदिशक्ति का अवतार हुआ था, जहां इनका नाम पार्वती रखा गया। युवा होने पर पार्वती के मन में भगवान शिव से विवाह की इच्छा हुई। लेकिन ऐसी संभावना न दिखने पर पार्वती ने तपस्या से स्थिति को बदलने का निश्चय किया। लेकिन तपस्या के चरम पर पहुंचने और सफल होने पर भगवान शिव को विवाह के लिए राजी होना पड़ा।बाद में दोनों पक्षों के विवाह के लिए राजी होने पर रूद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में ही दोनों का महाशिवरात्रि के दिन (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को) विवाह हुआ। मान्यता है कि इस विवाह में भगवान विष्णु ने पार्वती जी के भाई और ब्रह्माजी ने पुरोहित की भूमिका निभाई थी। मंदिर के सामने अग्निकुंड है जिसके दोनों ने फेरे लिए थे। मान्यता है कि तब से ही इस अग्निकुंड की लौ जल रही है। जिसे शिव पार्वती विवाह का प्रतीक माना जाता है। इस मंदिर को अखंड धूनी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस अग्निकुंड में प्रसाद के रूप में लकड़ियां डाली जाती हैं। श्रद्धालु इस अग्निकुंड की धुनी लेकर जाते हैं ताकि उनका पारिवारिक जीवन सुख समृद्धि वाला रहे।