ईरान युद्ध का साया: कच्चे तेल का संकट और भारत की 9.5 दिनों की ‘अग्निपरीक्षा’
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनें तेज कर दी हैं। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग, ‘होर्मुज की खाड़ी’ (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% तेल आयात करता है।
होर्मुज की खाड़ी: वैश्विक तेल सप्लाई की लाइफलाइन
होर्मुज की खाड़ी को दुनिया के तेल व्यापार की रीढ़ माना जाता है। वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20% हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग पूरी तरह बंद होता है,
तो यह आधुनिक इतिहास में तेल आपूर्ति की अब तक की सबसे बड़ी बाधा साबित होगी। युद्ध की स्थिति में टैंकरों पर हमले और समुद्री नाकेबंदी ने सप्लाई को ‘टाइट’ कर दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया है।
भारत की स्थिति: केवल 9.5 दिन का बैकअप
भारत के प्रमुख प्रकाशन इंडिया टुडे की एक हालिया रिपोर्ट और आरटीआई (RTI) से मिली जानकारी ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, यदि आयात पूरी तरह रुक जाता है, तो भारत का रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve – SPR) देश की जरूरतों को केवल 9.5 दिनों तक ही पूरा कर सकता है।
यह आंकड़ा भारत की विशाल अर्थव्यवस्था और तेल पर उसकी निर्भरता को देखते हुए काफी कम माना जा रहा है। हालांकि, रणनीतिक भंडार के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (OMCs) के पास भी कुछ दिनों का स्टॉक होता है, लेकिन सरकारी ‘इमरजेंसी रिजर्व’ की सीमा सीमित होना एक गंभीर चुनौती है।
क्या है स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) ?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ‘रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार’ कार्यक्रम की नींव 7 जनवरी, 2004 को रखी गई थी। इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए 16 जून, 2004 को इंडियन स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (ISPRL) का गठन किया गया।
वर्तमान में भारत के पास तीन मुख्य स्थानों पर अंडरग्राउंड रॉक केवर्न्स (गुफाएं) हैं जहाँ कच्चा तेल जमा किया जाता है:
विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)
मंगलुरु (कर्नाटक)
पाडुर (कर्नाटक)
इन भंडारों का उद्देश्य युद्ध, प्राकृतिक आपदा या किसी भी अन्य वैश्विक संकट के समय देश में तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत के ‘कैड’ (Current Account Deficit) और मुद्रास्फीति (Inflation) पर पड़ता है। यदि तेल महंगा होता है, तो परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे फल, सब्जियां और रोजमर्रा की अन्य वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। 9.5 दिनों का सीमित सुरक्षित भंडार सरकार के लिए एक चेतावनी की तरह है कि उसे अपने भंडारण क्षमता के दूसरे चरण (Phase-II) को जल्द से जल्द पूरा करना होगा, ताकि आपातकालीन बैकअप को कम से कम 30 से 90 दिनों तक ले जाया जा सके।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
ईरान संकट ने भारत को अपनी ऊर्जा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। जहाँ एक ओर नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) और इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर तेल के रणनीतिक भंडारों को बढ़ाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अनिवार्य हो गया है। फिलहाल, सरकार की नजरें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और तेल आपूर्ति के वैकल्पिक रास्तों पर टिकी हैं।
खबर इंटरनेट से प्राप्त सूत्रो के आधारित है

