आज के व्रत मे होता है सप्तऋषियों का पूजन
मकडाई एक्सप्रेस 24 भोपाल। आज भाद्रपद शुक्ल पंचमी को देशभर में ऋषि पंचमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। गणेश चतुर्थी के अगले दिन मनाया जाने वाला यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सुबह से ही महिलाओं ने नदी, तालाब में स्नान कर सप्तऋषियों की पूजा के साथ व्रत की शुरुआत की है।
व्रत का महत्व क्या है…?
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार यह व्रत मासिक धर्म के दौरान जाने-अनजाने में हुई गलतियों के दोष से मुक्ति के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और सप्तऋषियों की विधि-विधान से पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। अविवाहित कन्याएं अच्छे वर के लिए और सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
पूजन विधि
इस दिन महिलाएं सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अपामार्ग (चिरचिटा) की दातुन से स्नान करती हैं। घर के आंगन या पूजा स्थल को गोबर से लीपकर उस पर हल्दी, कुमकुम से चौकोर मंडल बनाती हैं। उस पर सप्तऋषि – कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पंचामृत, फल, फूल, अक्षत से पूजा की जाती है। इस व्रत में महिलाएं नमक का सेवन नहीं करतीं और एक समय फलाहार ग्रहण करती हैं।
ऋषि पंचमी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहता था। उसकी एक पुत्री थी जो विधवा हो गई। एक रात पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए। पिता ने इसका कारण जानने के लिए ध्यान लगाया तो पता चला कि पूर्व जन्म में पुत्री ने रजस्वला धर्म का पालन नहीं किया था और एक बार ऋषि पंचमी का व्रत भी भंग कर दिया था। तब पिता ने पुत्री को इस दोष की मुक्ति के लिए ऋषि पंचमी का व्रत करने को कहा। पुत्री ने विधि-विधान से व्रत किया तो उसे सभी कष्टों से मुक्ति मिली और अगले जन्म में उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई।
तभी से इस व्रत की परंपरा शुरू हुई।

