जहाँ रावण ने चढ़ाए थे अपने 10 सिर, जानें सिरवेल महादेव का रहस्य, खरगोन के घने जंगलों में छिपा है रामायण कालीन शिवधाम
मकडा़ई एक्सप्रेस 24 खरगोन। मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल में सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी पर एक ऐसा शिवधाम स्थित है, जिसके दर्शन के लिए 13 झरने और फिसलन भरी पहाड़ियां पार करनी पड़ती हैं। यह है खरगोन जिले की भगवानपुरा तहसील का प्रसिद्ध सिरवेल महादेव मंदिर। मान्यता है कि लंकापति रावण ने यहीं कठोर तपस्या कर भगवान शिव को अपने दस सिर अर्पित किए थे।
क्यों पड़ा नाम सिरवेल?
स्थानीय मान्यता के अनुसार यह शिवलिंग रामायण काल से स्थापित है। कथा है कि जब रावण की घोर तपस्या के बाद भी भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए, तो उसने अपना एक-एक कर दसों सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिया। ‘सिर’ अर्पित करने की इसी भूमि के कारण इस स्थान का नाम *सिरवेल (सिर + वेल)* पड़ा।
एक अन्य मान्यता के अनुसार रावण ने यहीं तप कर नौ ग्रहों को अपने वश में किया था। वहीं मार्कण्डेय पुराण में इस स्थान को मार्कण्डेय ऋषि की तपोभूमि भी बताया गया है।
13 झरनों और लोहे की सीढ़ी वाला कठिन ट्रैक
सिरवेल महादेव के दर्शन आसान नहीं हैं। खरगोन मुख्यालय से लगभग 55 किमी दूर महाराष्ट्र सीमा से सटे घने जंगल और वन्य जीव अभ्यारण्य के बीच यह मंदिर स्थित है। गुफा तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को घुमावदार पहाड़ों, *13 प्राकृतिक झरनों और कुंदा नदी* को पार करना पड़ता है। आने-जाने के लिए एक ही संकरा रास्ता है और अंत में लोहे की सीढ़ी चढ़कर ही गुफा में प्रवेश मिलता है।
चमत्कारिक शिवलिंग, 24 घंटे होता है प्राकृतिक अभिषेक
गुफा के अंदर स्थित शिवलिंग पर पहाड़ से 24 घंटे बूंद-बूंद पानी टपकता रहता है, जिसे भक्त चमत्कारिक अभिषेक मानते हैं। गुफा में ही माता पार्वती, नंदी और हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमाएं और एक गहरा देव कुंड भी है। लोक मान्यता है कि यहाँ दर्शन मात्र से सभी दुख और रोगों का नाश हो जाता है।
मेले और विशेष आयोजन
यहाँ 1965 से महाशिवरात्रि पर 3 दिवसीय विशाल मेले का आयोजन होता आ रहा है, जिसमें MP, महाराष्ट्र और गुजरात से लाखों श्रद्धालु आते हैं। वहीं श्रावण मास में अखंड जाप, महा आरती, विशेष अभिषेक और शिवडोले का आयोजन होता है। बरसात के मौसम में 13 झरनों के कारण यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है।

