मध्य प्रदेश के रीवा जिले के सिलचट गांव (Gurgi क्षेत्र के पास) में मिली प्राचीन प्रतिमा का रहस्य आज भी बरकरार कि यह काली चंडी कंकाली है कोई योगिनी ग्रामीण श्रद्धा से देवी मां समझकर पूज रहे है।
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 रीवा। मध्य प्रदेश का विंध्य क्षेत्र अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है। हाल ही में रीवा जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित सिलचट गांव में एक अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ प्रतिमा चर्चा का केंद्र बनी हुई है। करीब 1000 साल पुरानी यह प्रतिमा कलचुरी कालीन मानी जा रही है, जो न केवल उत्कृष्ट शिल्प कला का उदाहरण है, बल्कि उस काल की धार्मिक चेतना को भी दर्शाती है।
प्रतिमा का स्वरूप और विशेषताएँ
लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा लगभग 5 फीट लंबी और 3 फीट चौड़ी है। यह प्रतिमा एक ऊर्ध्वाधर शिला (Vertical Stone) पर मध्यम उभार के साथ उकेरी गई है। देवी ‘ललितासन’ मुद्रा में बैठी हैं, जिसमें उनका बायां पैर नीचे की ओर लटका हुआ है।
हाथो में विशेष आयुध
देवी की चार भुजाएं हैं। उन्होंने ऊपरी बाएं हाथ में एक नरमुंड और दाएं हाथ में धड़ विहीन शव उठा रखा है। निचले हाथों में लहरदार तलवार और कपाल (खप्पर) है।
चेहरे की भाव-भंगिमा
देवी का चेहरा रौद्र है, जिसमें बड़ी और बाहर निकली हुई आंखें, खुला हुआ मुंह और नुकीले दांत स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।उनके सिर के पीछे एक दिव्य प्रभामंडल और जुड़े में एक ‘कीर्ति मुख’ (खोपड़ी की आकृति) बनी हुई है।
रहस्य यह काली, चंडी या योगिनी कौन ?
इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच इस प्रतिमा की पहचान को लेकर अलग-अलग मत हैं
अन्ग्रेजी शासन काल मे ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार भारतीय पुरातत्व के जनक सर कनिंघम ने 1883-84 में इसे देखा था और इसे ‘काली कंकाली’ देवी कहा था। जिसे बाद में आर.डी. बनर्जी ने भी इसे काली प्रतिमा के रूप में ही वर्णित किया।
आधुनिक मत योगिनी प्रतिमा है
आधुनिक मत: कुछ शोधकर्ताओं, जैसे पुरातत्व विशेसज्ञ शिवम दुबे का मानना है कि इसके लक्षण काली देवी से मेल नहीं खाते, बल्कि यह देवी चंडी या योगिनी कौल संप्रदाय से संबंधित हो सकती है।
योगिनी कौल संप्रदाय और विंध्य का संबंध
विंध्य क्षेत्र में शक्ति उपासना की परंपरा प्रागैतिहासिक काल से रही है। सिलचट और गुर्गी के आसपास कई खंडित प्रतिमाएं मिली हैं, जो भेड़ाघाट के 64 योगिनी मंदिर की मूर्तियों से साम्यता रखती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्राचीन समय में यहाँ एक विशाल योगिनी मंदिर रहा होगा, क्योंकि यहाँ से उलूक योगिनी और अन्य योगिनियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
कलचुरी कालीन स्थापत्य का केंद्र ‘गुर्गी’
9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच यहाँ कलचुरी वंश का शासन था। गुर्गी उस समय कला और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र (School of Art) था।
खेत तालाबों मे बिखरे अवशेष
यहाँ के खेतों, तालाबों और गलियों में आज भी कलचुरी कालीन स्थापत्य के अवशेष बिखरे पड़े हैं, जो तत्कालीन डाहल मंडल की समृद्धि की गवाही देते हैं।
संरक्षण की आवश्यकता
मौजूदा हालात यह है कि यहां की लगभग 99% ऐतिहासिक धरोहरें समय के साथ नष्ट हो चुकी हैं। स्थानीय लोग इन प्राचीन प्रतिमाओं की आज भी अटूट श्रद्धा से पूजा करते हैं, लेकिन इनके वैज्ञानिक संरक्षण की भारी कमी है। पुरातत्व विभाग और स्थानीय समाज को इन अमूल्य पुरावशेषों को सहेजने की तत्काल आवश्यकता है ताकि विंध्य का यह गौरवमय इतिहास सुरक्षित रह सके।

