पीले कपड़ों में जब झूम उठे अमीर खुसरो… जानिए 700 साल पुरानी उस रवायत की कहानी जिसने मिटा दी मजहब की दीवारें
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 नई दिल्ली। भारत में वसंत पंचमी का त्योहार केवल ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द और अटूट आस्था का भी प्रतीक है।
देश की राजधानी दिल्ली स्थित प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पिछले सात सौ सालों से ‘सूफी वसंत’ मनाने की एक विशेष रवायत चली आ रही है। यह परंपरा आज भी मजहब की दीवारों को लांघकर गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल पेश करती है।
अमीर खुसरो और गुरु प्रेम की ऐतिहासिक गाथा
इस परंपरा की जड़ें 13वीं शताब्दी के इतिहास से जुड़ी हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भांजे के निधन के बाद गहरे शोक में थे। उनके प्रिय शिष्य, प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो, अपने गुरु की उदासी देख बेहद विचलित थे।
एक दिन खुसरो ने देखा कि कुछ लोग पीले वस्त्र पहनकर और सरसों के फूल लेकर गीत गाते हुए जा रहे हैं। जब उन्हें पता चला कि यह वसंत का उत्सव है, तो उन्होंने अपने गुरु को खुश करने के लिए खुद भी पीले कपड़े पहने और सरसों के फूल लेकर नाचते-गाते हुए उनके सामने पहुँच गए। खुसरो का यह अंदाज देखकर निजामुद्दीन औलिया मुस्कुरा पड़े और तभी से यह दिन दरगाह पर एक उत्सव बन गया।
पीली आभा में सराबोर होती है दरगाह
आज भी वसंत पंचमी के दिन दरगाह का नजारा देखने लायक होता है। पूरी मजार शरीफ को पीले गेंदे और सरसों के फूलों से सजाया जाता है। इस दिन हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग पीले परिधान पहनकर यहाँ इकट्ठा होते हैं। अमीर खुसरो की कालजयी रचनाएँ जैसे ‘सकल बन फूल रही सरसों…’की गूँज दरगाह के वातावरण को रूहानी बना देती है।
सांस्कृतिक एकता का जीवंत संदेश
हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर मनाया जाने वाला यह ‘सूफी वसंत’ केवल एक ऋतु उत्सव नहीं, बल्कि भारत की उस साझी विरासत का प्रमाण है जहाँ विभिन्न धर्मों की परंपराएं एक-दूसरे में समाहित हो जाती हैं। यह आयोजन आज के दौर में भी आपसी प्रेम, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का संदेश पूरी दुनिया को दे रहा है।

