हरदा : कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि फसल अवशेष को जलाना नहीं चाहिए, इससे मृदा में कार्बनिक पदार्थों का नुकसान होता है, लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं तथा हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है। फसल अवशेष जलाने से एरोसोल के कण निकलते हैं जो हवा को प्रदूषित करते हैं।
ऐसा देखा गया है कि 1 टन फसल अवशेष जलाने से 3 किलोग्राम पर्टिकुलेट मेटर, 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 1460 किलोग्राम कार्बन डायऑक्साइड, 199 किलोग्राम राख, 2 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है, जिससे नाक, गला, फेफड़े पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
यह पाया गया है कि 1 टन पराली जलाने से 10 से 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 से 40 किलोग्राम पोटाश, 5 से 7 किलोग्राम सल्फर 600-800 किलोग्राम ऑर्गेनिक कार्बन के साथ मृदा के मित्र जीवो का नुकसान होता है।
अवशेष प्रबंधन हेतु जीरो ट्रिल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल, हैप्पी सीडर, मल्चर, स्ट्रा बेलर , स्ट्रा रीपर, रीपर कम बाइंडर, हे रैक, वेस्ट डी कंपोजर आदि का उपयोग कर नरवाई प्रबंधन किया जा सकता है। यह सलाह दी गई है कि बेस्ट डीकंपोजर के उपयोग से जीवाणु एवं कवक नरवाई को अपघटन कर भूमि को पोषक तत्व प्रदान करते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरक पर निर्भरता कम होती है।
जैविक कार्बन सूक्ष्म जीवों का भोजन है, नमी की अवस्था में 20 से 25 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डाल दिया जाए तो सूक्ष्म जीवों द्वारा जल्दी फसल अवशेष से अपघटन हो जाता है, जिससे मृदा की संरचना मे सुधार होता है, वायु संचार एवं जलधारण क्षमता में विकास होता है।

