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खेती किसानी: खेतों में गेहूं बुआई के बाद किसान माछुंद्री माई की करते है पूजा

हरदा। माछुंद्री माई की जय मध्य प्रदेश के हरदा जिले की ग्रामीण संस्कृति में धरती के प्रति कृतज्ञता केवल भावना नहीं, बल्कि जीवंत परंपरा है। यहाँ खेतों की बुआई पूर्ण होने के पश्चात परिवार के सभी सदस्य एकत्र होकर धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यह आभार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म, सेवा और पूजन के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इसी परंपरा के अंतर्गत मछुंदरी माई का पूजन किया जाता है, जिन्हें क्षेत्र में धरती, जल और जीवन की संरक्षिका के रूप में माना जाता है।

बुआई के पश्चात खेत में विधिपूर्वक मछुंदरी माई का स्थान निर्मित किया जाता है। वहाँ हरे पत्तों, फसलों की टहनियों, धान-ज्वार के बंडों, फूलों और मिट्टी से एक प्रतीकात्मक मंडप सजाया जाता है। यह मंडप उस विश्वास का प्रतीक होता है कि धरती केवल भूमि नहीं, बल्कि जीवित चेतना है, जो अन्न, जल और जीवन प्रदान करती है। पूजन के समय परिवार की महिलाएँ और पुरुष समान श्रद्धा से सम्मिलित होते हैं। यह कोई कर्मकांड मात्र नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सामूहिक स्मृति का संस्कार है।

 

इस अवसर पर जल स्रोतों का विशेष पूजन किया जाता है। कुओं, बावड़ियों और जलाशयों को देवस्वरूप मानते हुए उनमें निवास करने वाले जीवों को भी भोजन अर्पित किया जाता है। कुएँ में पल रहे जीवों के लिए मालपुए अर्पित किए जाते हैं—यह संकेत है कि मानव अपने अन्न पर पहला अधिकार स्वयं नहीं, बल्कि प्रकृति के अन्य जीवों को देता है। यह सनातन दृष्टि बताती है कि जीवन केवल मानव केंद्रित नहीं, बल्कि समग्र जीव-जगत का साझा अधिकार है।

 

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खेतों में कार्य करने वाले सभी श्रमिकों को इस दिन गुड़, घूंगरी और मालपुए वितरित किए जाते हैं। यह केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि श्रम का सम्मान और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। किसान यह स्वीकार करता है कि अच्छी फसल केवल उसकी मेहनत से नहीं, बल्कि श्रमिकों, जल, मिट्टी, बीज और ऋतु—सभी के सहयोग से संभव होती है।

 

बुआई के पश्चात अनाज के बंडे भरने की परंपरा भी निभाई जाती है। पाँच घरों के लिए अनाज भरकर उसका पूजन किया जाता है। यह संकेत है कि फसल का पहला विचार स्वयं के भंडारण का नहीं, बल्कि समाज के पोषण का होता है। इस कर्म के माध्यम से यह संकल्प लिया जाता है कि आने वाली फसल केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का साधन बनेगी।

 

धरती माता के प्रति ऐसा गहन आभार, जहाँ जल, जीव, श्रमिक और समाज—सभी को समान महत्व दिया जाए, यह दृष्टि विश्व के बहुत कम संस्कृतियों में दिखाई देती है। सनातन शाश्वत धर्म की यही विशेषता है कि वह प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि माता मानता है। आज हमारे खेत में मछुंदरी माई का पूजन कर हमने उसी सनातन चेतना का पालन किया—यह स्मरण करते हुए कि अच्छी फसल केवल अनाज नहीं, बल्कि संतुलित जीवन, कृतज्ञता और प्रकृति के साथ सामंजस्य का परिणाम होती है।