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टप से पक्की दुकान तक… हंडिया में अतिक्रमण का सिलसिला आखिर थमेगा कब?

बस स्टैंड क्षेत्र में स्थिति जस की तस, पुराने बस स्टैंड चौराहे पर भी शुरू हुआ टपों का विस्तार

हंडिया में सरकारी जमीन और सार्वजनिक रास्तों के किनारे अतिक्रमण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। खास बात यह है कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिस पर प्रशासन की नजर नहीं हो। मौके की स्थिति सामने है, अधिकारी भी क्षेत्र से अनजान नहीं हैं और जनप्रतिनिधि भी पूरे घटनाक्रम से परिचित बताए जाते हैं। इसके बावजूद कार्रवाई के अभाव में टप रखने से लेकर उसे स्थायी स्वरूप देने और फिर दुकान संचालित करने का सिलसिला लगातार आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

9 अगस्त को उठाया था सवाल, अब तक स्थिति जस की तस

हंडिया बस स्टैंड क्षेत्र में मुर्गा-मछली मार्केट के सामने हाईवे किनारे रखे गए टपों को सीमेंट से स्थायी स्वरूप दिए जाने को लेकर 9 अगस्त 2026 को मकड़ाई एक्सप्रेस 24 ने प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी। खबर के बाद तहसीलदार द्वारा मामले की जांच कराने और यह पता लगाने की बात कही गई थी कि अतिक्रमण किसने करवाया और इसके लिए अनुमति किस स्तर से मिली।

लेकिन अब तक मौके से निर्माण हटाए जाने या किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है। उल्टा जिस टप के स्थायी निर्माण को लेकर सवाल उठे थे, वहां दुकान का संचालन शुरू हो चुका है।

यानी सवाल अब सिर्फ टप रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि जांच के आश्वासन के बाद भी कथित अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

पहले टप, फिर सीमेंट का निर्माण और अब दुकान

बस स्टैंड क्षेत्र में सामने आई स्थिति को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शासकीय भूमि पर पहले अस्थायी ढांचा खड़ा किया जाए, फिर धीरे-धीरे उसे पक्का स्वरूप दिया जाए और अंत में वहां बाकायदा व्यवसाय शुरू कर दिया जाए?

यदि भूमि शासकीय है और कोई वैध अनुमति नहीं है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?और यदि अनुमति है, तो संबंधित अनुमति एवं दस्तावेज सामने क्यों नहीं रखे जा रहे?यह स्पष्ट होना जरूरी है, क्योंकि मामला किसी निजी जमीन पर दुकान बनाने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक उपयोग वाले क्षेत्र और रास्ते से जुड़ा हुआ है।

अब पुराने बस स्टैंड चौराहे पर भी वही तस्वीर

मामला केवल वर्तमान बस स्टैंड तक सीमित नहीं है। पुराने बस स्टैंड के चौराहे पर भी अब इसी तरह टप लगाने और उन्हें व्यवस्थित रूप देने की प्रक्रिया दिखाई देने लगी है।यहां भी सड़क और सार्वजनिक आवागमन से जुड़े स्थानों पर जगह का उपयोग व्यवसायिक गतिविधियों के लिए किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।ऐसे में सवाल यह है कि एक जगह कार्रवाई नहीं होने का संदेश क्या दूसरी जगहों पर भी अतिक्रमण को बढ़ावा दे रहा है?

प्रशासन की नजर के सामने सबकुछ, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

हंडिया में सड़क किनारे और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले ऐसे निर्माण या अतिक्रमण अचानक रातों-रात सामने नहीं आते। टप रखा जाता है, लंबे समय तक दिखाई देता है, फिर उसमें निर्माण होता है और धीरे-धीरे वह स्थायी दुकान का रूप लेने लगता है।ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि संबंधित विभागों और स्थानीय जिम्मेदारों की नजर इस पर नहीं पड़ती होगी।

फिर सवाल उठता है—नजर पड़ने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?

जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जहां कुछ जनप्रतिनिधि मामले से अनजान नजर आते हैं, वहीं कुछ के बारे में लोगों के बीच यह चर्चा है कि वे अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे कारोबारियों का समर्थन करते दिखाई देते हैं। हालांकि इस संबंध में किसी व्यक्ति पर सीधे आरोप लगाने के बजाय वास्तविक स्थिति और प्रशासनिक रिकॉर्ड का सामने आना जरूरी है।

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रोजगार जरूरी है, लेकिन सरकारी जमीन पर क्यों?

किसी व्यक्ति का रोजगार करना गलत नहीं है। हर व्यक्ति अपने परिवार के लिए मेहनत कर रोजी-रोटी कमाना चाहता है और इसका सम्मान होना चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि रोजगार के लिए निजी अथवा बिधिबत आबंटित जमीन का उपयोग करने के बजाय सरकारी उपयोग की जमीन पर ही दुकान क्यों लगाई जाए?

यदि प्रशासन की अनुमति और नियमों के तहत स्थान उपलब्ध कराया जाता है तो व्यवसाय भी हो और व्यवस्था भी बनी रहे। लेकिन सड़क किनारे या सार्वजनिक रास्ते पर धीरे-धीरे स्थायी निर्माण खड़ा होना भविष्य में यातायात और आमजन की परेशानी का कारण बन सकता है।

अब प्रशासन से सीधा सवाल

बस स्टैंड और पुराने बस स्टैंड—दोनों स्थानों की स्थिति को देखते हुए अब प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि:

क्या संबंधित जमीन शासकीय है?

क्या इन टपों अथवा दुकानों के लिए कोई वैध अनुमति दी गई है?

9 अगस्त को उठाए गए मामले की जांच कहां तक पहुंची?

मौके का निरीक्षण हुआ या नहीं?

यदि निर्माण अवैध है तो अब तक हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

और यदि निर्माण वैध है तो उसकी अनुमति का आधार क्या है?

हंडिया जैसे धार्मिक और व्यस्त कस्बे में विकास जरूरी है,लेकिन विकास का मतलब सार्वजनिक रास्तों और सरकारी जमीन पर धीरे-धीरे कब्जे को स्थायी रूप देना नहीं हो सकता।

अब निगाह प्रशासन पर है कि वह इस पूरे मामले में नियम के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई करता है या फिर टप से दुकान तक पहुंच चुके अतिक्रमण का सिलसिला यूं ही आगे बढ़ता रहता है।

मकड़ाई एक्सप्रेस 24 इस मामले में प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर नजर बनाए रखेगा।