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अंग्रेज़ों के जमाने में ‘एजुकेशन हब’ रहा हिरनखेड़ा आज भी इंटरमीडिएट स्कूल भवन को तरस रहा

तीन एकड़ दान की जमीन, दो बार स्वीकृत भवन—

पर निर्माण हर बार दूसरी जगह; 2011 में फिर बना हायर सेकेंडरी, पर जर्जर भवन में चल रही पढ़ाई

के के यदुवंशी 

सिवनी मालवा। एक ओर आज़ादी से पहले हिरनखेड़ा को इंटरमीडिएट आवासीय विद्यालय के कारण शिक्षा का केंद्र माना जाता था, वहीं आज़ादी के बाद यह पहचान लापरवाही और राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ गई। ग्रामीणों का कहना है कि यहाँ न सिर्फ स्कूली पढ़ाई बल्कि विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था भी थी, जो बाद में बंद हो गई।

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ग्रामीणों के अनुसार, राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी की प्रेरणा से चली आवासीय व्यवस्था आज़ादी के बाद खत्म हो गई और “सेवा सदन विद्या मंदिर” की जमीन भी बाद में बेच दी गई। 70 के दशक में स्कूल की पुनर्स्थापना की माँग तेज़ हुई। 5 जनवरी 1981 को पंडित जी के नाम पर हायर सेकेंडरी विद्यालय स्थापित तो हुआ,

पर यह तत्कालीन पंचायत सचिवालय भवन में संचालित होता रहा। इसी दौरान तत्कालीन सरपंच बिजोरिया ने शासन को हायर सेकेंडरी भवन के लिए तीन एकड़ भूमि दान की, फिर भी भवन नहीं बन पाया।

1991 में भवन निर्माण की मंज़ूरी मिलने के बावजूद राजनीतिक दबाव के चलते निर्माण अन्यत्र कर दिया गया। इतना ही नहीं, हायर सेकेंडरी को डिमोट कर हाई स्कूल में बदल दिया गया। विरोध के बाद लगभग दो दशक बाद 2011 में इसका उन्नयन कर फिर से हायर सेकेंडरी का दर्जा मिला। 2018 में शासन स्तर से एक बार फिर नवीन भवन आवंटित हुआ, लेआउट भी डाला गया, लेकिन आरोप है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण यह भवन भी दूसरी जगह बना दिया गया।

आदिवासी बहुल क्षेत्र के इस प्रमुख गाँव में आज भी माखनलाल चतुर्वेदी के नाम से संचालित विद्यालय का भवन जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। वर्तमान सरपंच अमृता लिटोरिया ने बताया कि उन्होंने शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को पत्र लिखकर इस विषय पर ध्यान देने का आग्रह किया है। ग्रामीणों की माँग है कि दादा माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मस्थली पर उनके नाम से चल रहे विद्यालय के लिए शीघ्र नवीन भवन स्वीकृत कर निर्माण शुरू किया जाए, ताकि हिरनखेड़ा की पुरानी शैक्षिक पहचान बहाल हो सके।