नरेंद्र मौर्य के साथ-साथ रहे साहित्यकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने श्रद्धांजलि स्वरूप किये शब्द सुमन अर्पित !
मकड़ाई समाचार हरदा: भरे घड़े का कंठ अवरुद्ध हो जाता है। उसके बोल,उसके वे आंसू होते हैं जो उसके कांपने पर छलक पड़ते हैं।आज सुबह से जबसे नरेंद्र,नरेंद्र मौर्य के सदैव के
लिए चले जाने की खबर सुनी है तब से मन, सुधियों से भरपूर घड़ा हो गया है,कंठ तक भरा हुआ जो सुधियों की हिलोर से छलक पड़ता है बोल नहीं पाता।
कल उससे दोपहर तीन बजे सत्तर बरस का साथ सदैव के लिए छूट गया।
वह मुझसे तीन बरस बड़ा था लेकिन मैत्री उम्र से बहुत बड़ी थी।उम्र का छोर था, दोस्ती अछोर थी।
हम साथ साथ बनियान और पट्टीदार पाजामा पहने उसके गांव कड़ोला और हरदा में घूमे, शायद पंद्रह बरस के होंगे।साथ साथ बड़े होते रहे,साथ साथ हरदा में पढ़ते रहे,चुनाव भी कॉलेज में पैनल बनाकर लड़ते रहे,फिर भोपाल में साथ साथ रहे,साथ साथ ही खूब भूखे रहे, भोपाल के तब के इब्राहिमपुरे के दैनिक भास्कर के दफ्तर में उसने अखबार के लिए फर्मे बनाए, मैंने उनके प्रूफ पढ़े,साथ साथ लिखना शुरू किया, स्वर्गीय माणिक वर्मा जी के सान्निध्य का लाभ लेकर उनके कवि मित्रों को केवल मार्ग व्यय देकर साथ साथ कवि सम्मेलन कराए”नरेंद्र कोहली:व्यक्तित्व और कृतित्व”,तथा “समानांतर लघुकथाएं ” साथ साथ संपादित कीं ,उसकी कहानी “कोलंबस जिंदा है”, पर दीप्ति नवल और फारुख शेख द्वारा अभिनीत फिल्म “साथ साथ “बनी जिसका शीर्षक भी हमारे साथ का ही पर्याय था और साथ साथ बहुत कुछ ऐसा किया जो शब्दातीत है।
विवशताओं के चलते ऐसा नहीं होता कि वह एक ही शहर में रहे, रोज़ रोज़ साथ ही रहे लेकिन संसार में यदि दोनों हैं और दोनों के दिल धड़क रहे हैं तो फिर यह “साथ साथ” ही है।
लेकिन मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि यह साथ,कल दोपहर तीन बजे कैसे बिछुड़ने में बदल गया।ऐसा तो कोई इशारा तक उसने कभी नहीं किया था।
अब हरदा जाऊंगा,और जाऊंगा भी तो कौन बताएगा कि ऐसा क्यों हो गया?कुछ ऐसा ही मेरे अनुज निर्मल ने मेरे साथ किया था।वह भी नरेंद्र का पक्का दोस्त था।उन दोनों की एक बड़ी पुरानी तस्वीर मिली।
सबसे छोटे भाई नवीन ने कुछ तस्वीरें भेजी हैं लेकिन मैं उसके साथ साथ ही रहना चाहता हूं।
तस्वीरें हैं तो जीवन के क्षणों की लेकिन वे आज सदैव के लिए उससे बिछुड़ने की गवाह बन रही हैं।इन पर भरोसा करने का मन नहीं। तस्वीर को छायाचित्र भी कहते हैं और छाया भी कभी भरोसेमंद हुई है?अचानक अदृश्य हो जाती है।
इसलिए भरोसे तो तोड़ने वाले इन दोनों की निर्मल और नरेंद्र की तस्वीर भर साझा करता हूं दोनों उन पुस्तकों के मुखपृष्ठ के साथ जिन्हें साथ साथ संपादित किया।

