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राष्ट्रीय सुरक्षा कानून 1980: NSA क्या है और आम जनता को क्यों जानना जरूरी है….?

मकडा़ई एक्सप्रेस 24 विशेष। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी National Security Act, 1980 को संसद ने 23 सितंबर 1980 को पारित किया था। उस समय इंदिरा गांधी सरकार का मकसद था देश की एकता, सुरक्षा और शांति को किसी भी आंतरिक या बाहरी खतरे से बचाना।

इसे “निवारक हिरासत कानून” कहा जाता है। इसका मतलब ये है कि इसमें सजा अपराध होने के बाद नहीं, बल्कि अपराध होने से पहले दी जा सकती है। अगर सरकार या पुलिस को पुख्ता जानकारी मिले कि कोई व्यक्ति भविष्य में देश की सुरक्षा, सार्वजनिक शांति या जरूरी सेवाओं के लिए खतरा बन सकता है, तो उसे पहले ही हिरासत में लिया जा सकता है।

NSA के तहत कैसे होती है कार्रवाई? आम कानून से क्या अलग है….?

सामान्य आपराधिक कानून में पहले FIR होती है, फिर जांच, फिर कोर्ट में मुकदमा। लेकिन NSA में प्रक्रिया काफी अलग है।

NSA के 4 मुख्य प्रावधान

1. बिना मुकदमे के हिरासत – किसी व्यक्ति को 12 महीने तक बिना चार्जशीट के जेल में रखा जा सकता है। हर 3 महीने में एक “सलाहकार बोर्ड” इसकी समीक्षा करता है।

2. गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी, सबूत नहीं – गिरफ्तारी के 5 दिन के अंदर व्यक्ति को बताना होगा कि उसे क्यों पकड़ा गया। लेकिन पुलिस को ये बताने की जरूरत नहीं कि उसके पास क्या सबूत हैं।

3. जमानत में दिक्कत – NSA को “राष्ट्र की सुरक्षा” से जुड़ा मामला माना जाता है, इसलिए इसमें आसानी से जमानत नहीं मिलती।

4. कौन लगा सकता है? – केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जिला कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर को NSA लगाने का अधिकार है।

NSA किन लोगों पर लगाया जाता है….?

सरकार NSA का इस्तेमाल सिर्फ गंभीर मामलों में करती है। इसे 3 बड़े वर्गों में बांटा जा सकता है:

देश की सुरक्षा के खिलाफ – आतंकवाद, जासूसी, देशद्रोह, हथियार तस्करी में शामिल लोग।

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सार्वजनिक शांति भंग करने वाले – सांप्रदायिक दंगे भड़काने वाले, नफरत फैलाने वाले भाषण, अफवाह फैलाकर भीड़ उकसाने वाले।

आवश्यक सेवाएं रोकने वाले – दवाओं, अनाज, पेट्रोल की कालाबाजारी, बिजली-पानी की सप्लाई बाधित करने वाले, ड्रग्स और नकली नोट का कारोबार करने वाले

दो चर्चित उदाहरण – NSA कैसे लागू हुआ…..?

उदाहरण 1: डॉ. कफील खान मामला, 2020, उत्तर प्रदेश

डॉ. कफील खान पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में CAA विरोध के दौरान दिए गए भाषण के कारण NSA लगाया गया था। पुलिस का आरोप था कि उनके भाषण से सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। लेकिन 9 महीने बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA हटाते हुए कहा कि भाषण से “सार्वजनिक व्यवस्था” को वास्तविक खतरा साबित नहीं हुआ। ये केस बताता है कि NSA का दुरुपयोग न हो, इसके लिए कोर्ट निगरानी करता है।

उदाहरण 2: मध्य प्रदेश में पत्थरबाज और गौ-तस्करी मामले, 2019 से अब तक

MP सरकार ने दंगों के दौरान पत्थरबाजी करने और बार-बार गौ-तस्करी में पकड़े जाने वाले आरोपियों पर NSA लगाया। सरकार का तर्क था कि ये लोग बार-बार अपराध करके समाज की शांति भंग करते हैं। ऐसे में निवारक हिरासत जरूरी है ताकि भविष्य में दंगे न हों।

आम नागरिक के लिए NSA से जुड़ी 3 जरूरी बातें

ये आम अपराधों के लिए नहीं है – चोरी, मारपीट, धोखाधड़ी जैसे सामान्य केस में NSA नहीं लगता। ये सिर्फ तब लगता है जब मामला “राष्ट्रीय सुरक्षा” या “सार्वजनिक व्यवस्था” से जुड़ा हो।

कोर्ट की निगरानी बनी रहती है – भले ही हिरासत निवारक हो, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट किसी भी NSA आदेश की समीक्षा कर सकते हैं और उसे रद्द भी कर सकते हैं।

जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल – सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि NSA “आखिरी हथियार” है। इसका इस्तेमाल सोच-समझकर होना चाहिए, ताकि निर्दोष लोगों के मौलिक अधिकार प्रभावित न हों।

आमजन को जानना जरुरी है

NSA सरकार को देश और समाज की रक्षा के लिए विशेष शक्ति देता है। लेकिन ये शक्ति तभी सही है जब इसका इस्तेमाल कानून के दायरे में और पारदर्शिता के साथ हो। एक जागरूक नागरिक के तौर पर हमें ये जानना जरूरी है कि NSA कब, क्यों और कैसे लगता है, ताकि हम अपने अधिकार भी समझें और देश की सुरक्षा में भी सहयोग कर सकें।