मकडा़ई एक्सप्रेस 24नई दिल्ली। मा.सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और श्री चंद्रशेखर की बेंच ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से निकलकर दूसरे धर्म में जाता है तो उसे पुरानी जाति के आधार पर आरक्षण नहीं मिलेगा। कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
कोर्ट ने साफ कहा – “सोशल बैकवर्डनेस को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता”। हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था में मिला पिछड़ापन दूसरे धर्म में जाने पर स्वत: पिछड़े वर्ग का दर्जा नहीं दिला सकता। संविधान के (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के पैरा-3 के तहत हिंदू, सिख और बौद्ध के अलावा किसी को SC का दर्जा नहीं मिल सकता। 3201
पहले के 2 विवादित मामलों के उदाहरण
सेल्वारानी बनाम तमिलनाडु सरकार (2024)
सेल्वारानी के माता-पिता ईसाई थे, वो चर्च जाती थीं, बपतिस्मा लिया था, फिर भी खुद को हिंदू बताकर SC सर्टिफिकेट से नौकरी मांग रही थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह दोहरा दावा संविधान के साथ धोखा है, सिर्फ आरक्षण के लालच से धर्म बदलना नहीं चलेगा।
चिंताडा आनंद – पादरी का मामला (24 मार्च 2026)
आंध्र प्रदेश के मडिगा समुदाय के व्यक्ति ने ईसाई धर्म अपनाकर 10 साल तक पादरी के रूप में प्रार्थना कराई, फिर SC/ST एक्ट में केस दर्ज किया। मा.सुप्रीम कोर्ट ने कहा – ईसाई धर्म अपनाते ही SC स्टेटस पूरी तरह खत्म हो जाता है, अब उसे आरक्षण या SC/ST एक्ट की सुरक्षा नहीं मिलेगी।
अभी का ताजा मामला
ताजा मामला समीर अहमद का था जो 2015 में हिंदू से मुस्लिम बना और मुस्लिम लब्बई समुदाय में आरक्षण मांग रहा था, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

