नई दिल्ली। दुनिया भर में आबादी को लेकर चिंताएं अकसर होती रहती हैं। अब एक सर्वे से पता चला है कि 2010 से 2020 के दौरान दुनिया में ईसाई बहुल देशों की संख्या कम हुई है। ईसाई बहुल देशों की संख्या दुनिया में 2010 में 124 थी, जो 2020 में घटकर 120 पर आ गई है। इसकी वजह है कि कई देशों में ईसाई आबादी का कम हुई है। जनसंख्या वृद्धि दर में कमी और अपने धर्म को छोड़कर नास्तिक बनना या किसी और धर्म को अपनाना इसकी अहम वजह है। जिन देशों में ईसाई आबादी अब बहुसंख्यक नहीं रही, वहां कमी का कारण बड़ी संख्या में लोगों का धर्म छोड़ना। ये लोग खुद को अब किसी भी धर्म से नहीं जोड़ते हैं। ये खुद को नास्तिक, अज्ञेयवादी अथवा अनीश्वरवादी मानते हैं।
कुल मिलाकर ईसाई देशों की संख्या में 10 सालों के अंतराल में कमी आई और 4 देश नक्शे से घट गए। कुल 5 फीसदी देश दुनिया के ऐसे हैं, जहां बहुसंख्यक आबादी किसी भी धर्म को ना मानने वालों की है। इन देशों में अब बहुसंख्यक आबादी ईसाई नहीं रही। इन देशों में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और उरुग्वे जैसे बड़े देश हैं। अब यूके में ईसाई आबादी 49 फीसदी बची है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया में 47 फीसदी, फ्रांस में 46 और उरुग्वे में 44 फीसदी ईसाई जनसंख्या बची है। उरुग्वे में किसी भी धर्म को ना मानने वालों की संख्या 52 फीसदी है। एक और तथ्य यह है कि नीदरलैंड में भी 54 फीसदी अब किसी मजहब को न मानने वालों का है। इसके अलावा न्यूजीलैंड में यह नंबर 51 फीसदी है। दुनिया के 201 मान्यता प्राप्त देशों में अब 120 ही ईसाई बहुल बचे हैं। इसके अलावा मुस्लिम देश हैं।
हिंदू बहुल सिर्फ दो देश ही हैं। वह हैं भारत और नेपाल जिनमें 95 फीसदी हिंदू आबादी अकेले भारत में ही रहती है। इसके अलावा बाकी 5 फीसदी हिंदू पूरी दुनिया में बिखरे हुए हैं। यही नहीं दुनिया की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 15 फीसदी है। कुल मिलाकर दुनिया के 60 फीसदी देश अब भी ईसाई बहुल है। हालांकि आने वाले दशकों में इस स्थिति में और बदलाव हो सकता है। कुछ और देश ईसाई बहुल होने का तमगा खो सकते हैं।

