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मऊगंज में संबल याेजना में चल रहा मौत के मुनाफे का खेल, गरीबों के हक पर डाका डाल रहे दलाल

मऊगंज। जिला बना, विकास की उम्मीद जगी, लेकिन यहां मौत पर भी मुनाफे का खेल चल रहा है। गरीबों के लिए बनाई गई योजनाएं ही यदि उनके शोषण का जरिया बन जाएं, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि सामाजिक न्याय पर भी बड़ा सवाल है।

इंसानियत को किया शर्मसार

मऊगंज से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है। जहां सरकार गरीबों के सहारे के लिए योजनाएं बना रही है, वहीं कुछ भ्रष्ट लोग उसी सहारे को लूट का जरिया बना बैठे हैं। संबल योजना, जो मौत के बाद परिवार को संभालने के लिए बनी थी, अब दलालों के लिए कमाई का धंधा बन गई है।

मौत होते ही सक्रिय होता है गिरोह

गांव में जैसे ही किसी गरीब परिवार में मौत होती है, आंसुओं के बीच एक और खौफनाक खेल शुरू हो जाता है। शोक में डूबे घर तक सबसे पहले पहुंचते हैं दलाल-हाथ में हमदर्दी, दिमाग में सौदा। सरकारी मदद दिलाएंगे का झांसा देकर ये लोग आधार कार्ड, बैंक पासबुक और चेक अपने कब्जे में ले लेते हैं। अशिक्षा और मजबूरी का फायदा उठाकर यह गिरोह गरीबों के हक पर डाका डालता है। परिवार को उम्मीद दी जाती है राहत की, लेकिन असल में उनके नाम की रकम बीच रास्ते में ही लूट ली जाती है। मौत का मातम खत्म भी नहीं होता, और लूट का हिसाब शुरू हो जाता है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीबी और दर्द पर पलता हुआ एक निर्दयी कारोबार है, जो इंसानियत को हर रोज शर्मसार कर रहा है।

खाते में पैसे आते ही खेल खत्म

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सरकार की ओर से मिलने वाली 2 लाख से 4 लाख रुपए की सहायता राशि गरीबों तक पूरी नहीं पहुंचती। आरोप है कि बैंक से पैसा निकलवाकर बड़ा हिस्सा हड़प लिया जाता है और परिवार को सिर्फ नाममात्र की राशि थमा दी जाती है। अशिक्षा और जागरूकता की कमी का फायदा उठाकर गरीबों के साथ यह खेल किया जा रहा है। कई लोग डर या दबाव के कारण शिकायत भी नहीं कर पाते। इस पूरे मामले ने प्रशासन की निगरानी और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

फर्जी पंजीयन का भी बड़ा खेल

हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में मौत के बाद ही संबल कार्ड बनाकर फर्जी तरीके से राशि निकाली जा रही है। यानी कि मौत भी अब इनके लिए मौका बन गई है। मामले में पीड़ित रमेश विश्वकर्मा सहित कई लाभार्थियों ने आरोप लगाया है कि उन्हें मिलने वाली लाखों रुपए की सहायता राशि में से आधी रकम गायब कर दी गई। जब उन्होंने इस गड़बड़ी पर सवाल उठाया, तो उन्हें जवाब मिला कि सरपंच, सचिव से लेकर जनपद तक हिस्सा जाता है।

डर और दबाव के साथ बढ़ता आक्रोश

पीड़ितों का कहना है कि उन्हें चुप रहने के लिए डराया-धमकाया भी गया, लेकिन अब वे न्याय की मांग को लेकर सामने आ रहे हैं। इस मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।

पूरा सिस्टम कटघरे में

दलालों द्वारा सरपंच, सचिव और जनपद तक फैले कमीशनखोरी के आरोपों ने पूरे तंत्र की पोल खोल दी है। गरीबों के हक की योजनाएं अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं. सवाल सिर्फ दलालों का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जो या तो आंखें मूंदे बैठा रहा या खुद इस खेल में शामिल रहा। क्या बिना ऊपर तक मिलीभगत के यह संभव था? यह सिर्फ घोटाला नहीं, बल्कि इंसानियत के साथ खिलवाड़ है। अब वक्त है सख्त जांच, कड़ी कार्रवाई और जवाबदेही तय करने का, ताकि जनता का टूटा भरोसा फिर से कायम हो सके। पीड़ित परिवार अब कलेक्टर जनसुनवाई में न्याय की गुहार लगा रहे हैं। उनका साफ कहना है—अगर इंसाफ नहीं मिला, तो जान देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।