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बेहतर मृदा स्वास्थ्य के लिए संतुलित मात्रा में करें उर्वरकों का उपयोग

मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करने की कृषि वैज्ञानिकों ने दी सलाह

हरदा : मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने और फसलों से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करना आवश्यक है। कृषि विज्ञान केंद्र, हरदा की वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संध्या मुरे ने जिले के किसानों से अपील की है कि वे मिट्टी परीक्षण के आधार पर फसलों में खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करें। उन्होंने जैविक खाद के साथ रासायनिक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करने पर जोर दिया।

कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ तकनीकी सहायक रितेश बागोरा ने बताया कि किसान फसलों में केवल यूरिया एवं डीएपी पर निर्भर न रहें, बल्कि आवश्यकतानुसार पोटाश सहित अन्य पोषक तत्वों का भी उपयोग करें। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है तथा फसल उत्पादन बेहतर किया जा सकता है।

डीएपी के विकल्प के रूप में अन्य उर्वरकों का करें उपयोग

रितेश बागोरा ने बताया कि डीएपी की उपलब्धता नहीं होने पर किसान सिंगल सुपर फास्फेट (एसएसपी), ट्रिपल सुपर फास्फेट अथवा उपयुक्त एनपीके ग्रेड के उर्वरकों का उपयोग कर सकते हैं। सिंगल सुपर फास्फेट में 16 प्रतिशत फास्फोरस के साथ 12 प्रतिशत सल्फर एवं 18 प्रतिशत कैल्शियम पाया जाता है। इससे दलहनी एवं तिलहनी फसलों में सल्फर की आवश्यकता पूरी करने में मदद मिलती है।

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इसी प्रकार एनपीके (12ः32ः16) उर्वरक से नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की आपूर्ति होती है। किसान फसल की आवश्यकता और मिट्टी परीक्षण की अनुशंसा के अनुसार उर्वरक का चयन करें।

नैनो डीएपी का उपयोग करते समय रखें ध्यान

डीएपी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने पर नैनो डीएपी का उपयोग भी किया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र के अनुसार, नैनो डीएपी का 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से फसल की 30-35 दिन तथा 50-55 दिन की अवस्था में छिड़काव करने की सलाह दी गई है। हालांकि, इसका प्रयोग फसल, उत्पाद के लेबल और कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार ही करना चाहिए।

जैव उर्वरकों से भी मिलेगा लाभ

कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि जैव उर्वरकों से बीज एवं मृदा उपचार करने से पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। उचित तकनीक अपनाने पर रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता में 25 से 30 प्रतिशत तक कमी संभव है। इससे खेती की लागत कम करने, मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने और बेहतर फसल उत्पादन प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।

कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों से अपील की है कि वे मिट्टी परीक्षण, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और जैव उर्वरकों के समुचित उपयोग को अपनाकर मिट्टी की सेहत बनाए रखें तथा टिकाऊ कृषि उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ें।