हंडिया । नर्मदा नदी में रोजाना मत्स्याखेट व्यापक स्तर पर किया जा रहा है।और संबंधित विभाग के उच्च अधिकारी अनजान हैं। मां नर्मदा में विभिन्न प्रकार के जाल और जालियों से जारी मत्स्याखेट के चलते नदी में मौजूद विविध प्रजातियों की मछलियों पर संकट खड़ा हो रहा है। हडिया तहसील मुख्यालय सहित मां नर्मदा के किनारे बसे ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रतिबंध कागजी साबित हो रहा है। यह प्रतिबंध प्रजनन काल में मछलियों की वंश वृद्धि को दृष्टिगत रखते हुए लगाया गया था। कलेक्टर द्वारा लागू किया गया उक्त प्रतिबंध कागजों पर भले ही लागू हो लेकिन मौके पर झूठा साबित हो रहा है।
सोमवार रात और मंगलवार के दिन पड़ताल में मालूम हुआ कि तहसील क्षेत्र के अंतर्गत नर्मदा किनारे के अनेक ग्रामों में मछली मारने का काम खुलेआम जारी है। प्रजनन काल के दौरान मछली का शिकार हो रहा है, मछली खुलेआम मारी जा रही हैं। जिले के लिए प्रभावी आदेश मैदानी तौर पर हर साल नाकाम साबित होता रहा है, जो इस बार भी पूरी तरह से असरहीन दिखाई दे रहा है।
कुल मिलाकर संबंधित विभाग की उदासीनता के चलते हमेशा से एक लजीज खाद्य मानी जाने वाली
तरह-तरह की मछलियां प्रजनन काल में भी सुरक्षित नहीं हैं। ये सब नजारे आम लोगों को तो दिख रहे हैं. लेकिन अधिकारियों को नजर नहीं आ रहे हैं।
प्रतिबंध प्रतिवर्ष दो माह के लिए लगाया जाता है, बावजूद इसके आदेश का पालन किसी भी स्तर पर गंभीरता के साथ सुनिश्चित नहीं हो पाता। यही वजह है कि प्रतिबंध की अवधि में मत्स्याखेट का दृश्य आम तौर पर सामने आता हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि वैधानिक प्रावधानों के तहत जारी किए जाने वाले इस प्रतिबंध का मकसद मछलियों की वंशवृद्धि तय करना होता है, जिसके लिए वर्षाकाल सर्वाधिक अनुकूल रहता है। इस अवधि में मत्स्याखेट मछलियों की बढ़ोतरी में बाधक तो बनता ही है साथ ही लोक स्वास्थ्य को भी चुनौती देता है,

