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संयुक्त राष्ट्र संघ को हुए 80 साल, क्यों अमेरिका की चलती हैं दादागिरी

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र संघ को स्थापना के 80 साल पूरे हो रहे हैं। दुनिया के किसी भी देश के लिए अपनी समस्याओं को रखने या फिर वैश्विक मामलों में चर्चा के लिए एकमात्र सार्वभौमिक मंच है। यही मंच है, जिस पर भारत की ओर से आतंकवाद को लेकर चिंता जाहिर की जाती है। इसके अलावा यूक्रेन रूस युद्ध और इजरायल एवं फिलिस्तीन में जारी जंग पर भी मंच पर चर्चा होती है। हालांकि अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़ी कई संस्थाओं से खुद को अलग कर लिया है। इससे संस्थाओं की फंडिंग पर असर की बात की जा रही है।
अमेरिका ने बीते कुछ सालों में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ और मानवाधिकार परिषद को छोड़ दिया है। इसके अलावा अगले साल के अंत तक यूनेस्को से भी अमेरिका अलग होगा। इतना ही नहीं यूएन के मुख्य फंड में कटौती करने की भी तैयारी अमेरिका कर रहा है। यही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा था कि उसके पास बजट की कमी है और इसके चलते अपनी कुछ योजनाओं से हाथ पीछे खींचना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के फंड में सदस्यों की ओर से जो योगदान किया जाता है, वह दो हिस्सों में होता है। पहला और अहम हिस्सा संयुक्त राष्ट्र का रेगुलर बजट होता है। इसके अलावा दूसरा बजट पीसकीपींग का होता है।

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रेगुलर बजट में अमेरिका ने साल 2025 में इसमें 22 फीसदी का योगदान किया था। अमेरिका की ओर से 82 करोड़ 3 लाख डॉलर का योगदान किया गया है। इस तरह करीब एक चौथाई फंड अमेरिका ही देता है, जबकि 20 फीसदी राशि चीन की ओर से दी जाती है। जापान का इसमें 6 प्रतिशत योगदान है। जर्मनी 5.6, ब्रिटेन 3.9 और फ्रांस की तरफ से 3.8 फीसदी रकम दी जाती है। इनके अलावा टॉप 10 में इटली, कनाडा, साउथ कोरिया और रूस भी शामिल हैं। भारत का इस लिस्ट में 34वां स्थान है। भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र के लिए 3 करोड़ 76 लाख डॉलर की फंडिंग दी जाती है।

संयुक्त राष्ट्र के लिए जिस देश के हिस्से जो भी योगदान आता है, वह उसे प्रति वर्ष नियमित तौर पर देना होता है। यदि कभी किस्त नहीं चुकाई जाती, तब उस एरियर के तौर पर जोड़ लिया जाता है। यदि एरियर की रकम बीते दो सालों के योगदान से अधिक हो जाए तो फिर संबंधित सदस्य से संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में वोटिंग का अधिकार भी छिन सकता है। फिलहाल अफगानिस्तान, वेनेजुएला, बोलिविया, साओ टोम और प्रिंसिप की किस्त बकाया है। हालांकि साओ टोम और प्रिंसिप को वोटिंग की परमिशन दी गई है। संयुक्त राष्ट्र ने माना है कि ये दोनों बेहद छोटे द्वीपीय देश हैं।