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इंदौर की सियासत में हलचल: IDA चेयरमैन की दौड़ तेज, दिल्ली से लेकर भोपाल तक लॉबिंग

मकड़ाई एक्सप्रेस 24 इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के सबसे शक्तिशाली और समृद्ध निकाय, इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के अध्यक्ष पद की नियुक्ति को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाले इस महत्वपूर्ण पद के लिए भाजपा के भीतर अलग-अलग खेमों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। अब अंतिम गेंद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पाले में है।

शक्तिशाली पद और दिग्गजों की दावेदारी

IDA प्रदेश के सबसे धनी प्राधिकरणों में से एक है, जो शहर के विकास की दिशा तय करता है। यही कारण है कि इस पद पर काबिज होने के लिए पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर वर्तमान मंत्रियों तक के समर्थक कतार में हैं। संगठन और सत्ता के बीच सामंजस्य बिठाते हुए किसी एक नाम पर मुहर लगाना मुख्यमंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

सुदर्शन गुप्ता: पूर्व सीएम गुट का मजबूत चेहरा

सियासी गलियारों में चर्चा है कि पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता इस दौड़ में सबसे आगे चल रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का वरदहस्त प्राप्त है। इंदौर के अधिकांश विधायक, जिनमें मालिनी गौड़, महेंद्र हार्डिया और मधु वर्मा शामिल हैं, उनके पक्ष में बताए जा रहे हैं। हाल ही में वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई मुलाकातों के बाद उनके नाम की चर्चा ने और जोर पकड़ लिया है।

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संगठन और मंत्रियों की पसंद

दूसरी ओर, संगठन स्तर पर मुकेश राजावत का नाम तेजी से उभरा है। नगराध्यक्ष की दौड़ में पीछे रहने के बाद अब उन्हें IDA के जरिए एडजस्ट करने की रणनीति पर विचार हो रहा है। वहीं, नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका इस मामले में सबसे अहम मानी जा रही है। उनके खेमे से हरिनारायण यादव और कमलेश शर्मा जैसे नाम रेस में हैं। कमलेश शर्मा को संघ और संगठन के कुछ वर्गों का भी मौन समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है।

जातीय समीकरण और शक्ति संतुलन

नियुक्ति में ‘जातीय संतुलन’ एक बड़ा ‘एक्स-फैक्टर’ साबित हो सकता है। वर्तमान में इंदौर के महापौर और भाजपा नगराध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर एक ही वर्ग का प्रतिनिधित्व है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व यह विचार कर रहा है कि क्या IDA जैसे बड़े पद पर किसी अन्य वर्ग के चेहरे को मौका देकर सोशल इंजीनियरिंग को साधा जाए।

क्या होगा ‘सरप्राइज फैक्टर ‘?

भाजपा अक्सर अपने अप्रत्याशित फैसलों के लिए जानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन स्थापित नामों के बीच मुख्यमंत्री कोई नया या चौंकाने वाला नाम भी सामने ला सकते हैं। फिलहाल, इंदौर की जनता और कार्यकर्ताओं की नजरें भोपाल से होने वाली आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं, जो न केवल विकास की कमान तय करेगी, बल्कि शहर के शक्ति संतुलन का नया खाका भी खींचेगी।