छतरपुर। केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित विस्थापितों के हक की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। आंदोलन के छठे दिन धरना स्थल पर ऐसा भावुक दृश्य सामने आया, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। शासन-प्रशासन के आग्रह पर आंदोलनकारी अमित भटनागर के वृद्ध पिता और भाई अंकित भटनागर उन्हें मनाने धरना स्थल पहुंचे। उद्देश्य था—अमित को सांकेतिक चिता से उतारकर घर वापस ले जाना। लेकिन अमित के इरादे अडिग रहे।
“अब यही मेरा परिवार है”
जब पिता और भाई ने घर चलने की बात कही, तो हजारों की संख्या में मौजूद आदिवासी महिला-पुरुष और बच्चों के बीच सन्नाटा छा गया। पिन ड्रॉप साइलेंस के बीच अमित ने दृढ़ स्वर में कहा— “पिताजी, ये हजारों आदिवासी ही अब मेरा परिवार हैं। जब इनका भविष्य अंधकार में है, तो मैं उजाले में घर कैसे लौट सकता हूं? यदि आप मुझे ताकत नहीं दे सकते तो न दें, लेकिन ममता की बेड़ियों से कमजोर मत करें। अब अंत हो या इंसाफ—सब कुछ इसी मिट्टी पर होगा।”
अमित के इस संकल्प के आगे खून के रिश्ते भी छोटे पड़ते नजर आए।
बेबस पिता की आंखों में गर्व
अपने बेटे को मनाने पहुंचे पिता और भाई शुरुआत में आक्रोशित दिखे, लेकिन जब उन्होंने आदिवासियों की आंखों में अमित के प्रति विश्वास देखा, तो भावुक हो उठे। एक पिता की आंखों में बेबसी के साथ-साथ गर्व भी झलक रहा था—मानो उन्हें अहसास हो गया हो कि उनका बेटा न्याय की राह पर है।
रिश्तों की हार, संघर्ष की जीत
पिता और भाई भले ही अमित को साथ नहीं ले जा सके, लेकिन उनकी खामोशी में बेटे के प्रति गर्व साफ झलक रहा था। अमित ने साबित कर दिया कि जब हजारों परिवारों के अस्तित्व की बात हो, तो निजी सुख-दुख छोटे पड़ जाते हैं। आज पूरा बुंदेलखंड इस संघर्ष को देख रहा है, जहां एक व्यक्ति अपने परिवार से ऊपर उठकर हजारों विस्थापितों के अधिकारों के लिए लड़ रहा है।
कठिन हालात में जारी आंदोलन
जिस स्थान पर यह आंदोलन चल रहा है, वह घना और भयावह जंगल क्षेत्र है। यहां न बिजली है, न स्वच्छ पेयजल और न ही पर्याप्त राशन। भीषण गर्मी और संसाधनों की कमी के चलते कई आंदोलनकारियों की तबीयत बिगड़ रही है। हालांकि प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य टीम भेजकर उपचार कराया जा रहा है, वहीं आसपास के ग्रामीण स्वयं भोजन और राशन की व्यवस्था कर आंदोलन को जीवित रखे हुए हैं।
चिता पर लेटा आंदोलन
अमित पिछले 6 दिनों से सांकेतिक चिता पर लेटकर प्रदर्शन कर रहे हैं। इस अनोखे विरोध ने प्रशासनिक तंत्र को भी झकझोर दिया है।
धारा 163 लागू होने के बावजूद हजारों आदिवासी आंदोलन स्थल पर डटे हुए हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि ग्राम सभाओं की सहमति केवल कागजों में दिखाई गई, जबकि जमीनी स्तर पर सही सर्वे नहीं हुआ।

