श्रद्धांजलि – शब्द सुमन: श्याम साकल्ले और नरेंद्र मौर्य के मित्र वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने फ़ेसबुक पर लिखा – 💐💐
#नरेंद्र_मौर्य_का_यूं_जाना
मित्रो ! कल रात ,10.40 पर जब स्व0 श्याम साकल्ले की बेटी ऋचा साकल्ले ने व्हाट्सएप पर सूचना दी कि नरेंद्र मौर्य का दुखद निधन हो गया है तो बरसों पुराने दोस्त का यूं जाना आहत कर गया। लगभग छह – सात बरस से इस प्यारे दोस्त के साथ संवाद न के बराबर था, फिर भी ये सोचकर तसल्ली रहती कि वह है और कभी न कभी संवाद होगा। कल रात ये तसल्ली भी दगा दे गई। रात भर पुरानी स्मृतियां बेचैन करती रहीं। ऐसे समय में जब दोस्तियां प्रोडक्ट बन गई हैं, यूज़ और थ्रो बन गई हैं, नरेंद्र मौर्य जैसे दोस्त का जाना अमूल्य खजाने का लुटने जैसा है।
सुबह नरेंद्र मौर्य के पुराने सहपाठी नर्मदाप्रसाद उपाध्याय और पुराने दोस्त धीरेन्द्र अस्थाना से लंबी बातचीत हुई । हमने पुरानी स्मृतियों को एक दूसरे से साझा किया।
नरेंद्र मौर्य से मेरी अंतिम मुलाकात 14 सितंबर 2017 को भोपाल में हुई थी। उस दिन मुझे शरद जोशी राष्ट्रीय सम्मान मिलना था। अस्वस्थ होने के बावजूद वह , अपने दोस्तों के साथ, विशेषरूप से मुझसे मिलने आया था।
नरेंद्र मौर्य से जुडी स्मृतियां ताज़ा हुईं तो श्रद्धेय नरेंद्र कोहली से जुड़ी स्मृतियां ताज़ा हो गईं। नरेंद्र मौर्य, नरेंद्र कोहली के लेखन और व्यक्तित्व के, भक्त जैसे प्रशंसक थे। शायद 1977 की बात है जब मैं, नरेंद्र कोहली और उनका पुत्र कार्तिकेय ,हरदा, खंडवा, इंदौर आदि की यात्रा पर गए थे। वैसे तो नरेंद्र मौर्य किसी की आवभगत दिल खोलकर करने के लिए प्रसिद्ध था पर उस दिन तो जैसे उसके भगवान आए थे। इस आत्मीय वातावरण में मेरी और नरेंद्र मौर्य की मित्रता भी बहुत गहरी हो गई।
नरेंद्र मौर्य मुझसे 3 वर्ष बड़े थे। मुझे याद है कि ‘ सारिका ‘ में प्रकाशित उसकी कहानी ‘ कोलंबस जिंदा है ‘ ने तहलका मचा दिया था। इस पर दीप्ति नवल और फारूक शेख को लेकर शायद ‘ साथ साथ ‘ फिल्म बनी और बेहद चर्चित हुई। नरेंद्र मौर्य ने कमलेश्वर के चहेते रचनाकारों में थे।नरेंद्र मौर्य उन्होंने ‘समांतर लघुकथाएं ‘ नाम से संकलन भी संपादित किया था, जिसमें मुझे भी शामिल किया था।
1995 में हरिशंकर परसाई के जाने के कुछ समय बाद नरेंद्र मौर्य ने ,’ सतपुड़ा लोक सांस्कृतिक परिषद ‘ के तत्वावधान में हरिशंकर परसाई स्मृति सम्मान की घोषणा की थी। मेरा सम्मान बढ़ाते हुए, पहले हरिशंकर परसाई स्मृति सम्मान ‘ 1 मई 1997 को हरदा में दिया गया था।
दोस्त के लिए जी जान से मदद करने का किस्सा धीरेन्द्र ने भी मुझे सुनाया। नरेंद्र मौर्य ने धीरेन्द्र को एक आयोजन के सिलसिले में हरदा बुलाया था। आयोजन बेहतरीन था और खाना – पीना भी उतना ही बेहतरीन। इस बेहतरीन ने स्टेशन जाकर गाड़ी पकड़ने की जल्दी को अल्प विराम – सा लगा दिया । धीरेन्द्र का अगले दिन, ‘ सबरंग ‘ के कारण , मुंबई पहुंचना परम आवश्यक था। नरेंद्र ने गाड़ी भगाई , पर जैसे ही स्टेशन पहुंचे ट्रेन धीमी गति से प्लेटफार्म पार कर चुकी थी। अगले स्टेशन पर पकड़ने की नियत से नरेंद्र मौर्य ने कार को दौड़ाया। पर रेलगाड़ी की रफ्तार कर से तेज निकली और ट्रेन को छूटना था छूट गई। नरेंद्र मौर्य ने एक टैक्सी बुक करवाई जिसका उस समय भाड़ा 5000 रुपए था और धीरेन्द्र के मुंबई पहुंचने की व्यवस्था की। आजकल आप पर जान छिड़कने का दावा करने वाले दोस्तों की अक्सर वक्त आने पर जेबें सिली मिलती हैं। ऐसे में नरेंद्र मौर्य क्यों न याद आए। दोस्ती के मूल्य के सामने अन्य मूल्य उसकी दृष्टि में पत्थर के टुकड़े थे। पैसे को उसने साध्य नहीं साधन माना। अनेक पत्रिकाओं की आर्थिक मदद की।
बेटे की मृत्यु और ललिता की आकस्मिक मृत्यु ने उसे तोड़ दिया था। बहुत अस्वस्थ रहने लगा था। युवाकाल में जो नरेंद्र मौर्य रचनात्मक दृष्टि से अति सक्रिय और लोकप्रिय था वही बेनाम सा जीवन जीते हुए 80 वर्ष की आयु में अंतिम यात्रा को चला गया।
मेरी और व्यंग्य यात्रा परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि।
श्रद्धांजलि – शब्द सुमन 💐💐

