हाईकोर्ट का फैसले के बाद एससी एसटी की जमीन के सौदे करने से पहले सोचना होगा
मकडा़ई एक्सप्रेस 24प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे और धर्म परिवर्तन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल धर्म बदल लेने से किसी व्यक्ति की जनजातीय पहचान अपने आप खत्म नहीं हो जाती। हालांकि, जनजातीय जमीन खरीदने और आरक्षण के लाभ के लिए सिर्फ ST सर्टिफिकेट होना काफी नहीं है, व्यक्ति का अपने मूल समुदाय से जुड़ाव भी बना रहना चाहिए।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार की सिंगल बेंच ने सोनभद्र की नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा की तीन याचिकाएं खारिज कर दीं। याचिका में दुद्धी के डिप्टी कलेक्टर के 22 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उनकी 30 से ज्यादा जमीनों के बैनामे रद्द करके 5.714 हेक्टेयर जमीन को ग्राम सभा में निहित कर दिया गया था।
समझे पूरा मामला क्या है…?
याचिकाकर्ता ने खुद को जन्म से भुईंया-पनिका ST बताकर ST सर्टिफिकेट लिया था और 2011 से 2018 के बीच गोंड आदिवासी समाज के लोगों से कृषि भूमि खरीदी थी। जांच में सामने आया कि उन्होंने दशकों पहले सिराजुद्दीन से इस्लामिक रीति से निकाह किया था और उनका नाम नैमुन्निशा हो गया था। जिला प्रशासन का आरोप था कि उन्होंने पुरानी पहचान पर जालसाजी से आदिवासियों की जमीनें खरीदीं और बाद में अपने रिश्तेदारों को ट्रांसफर कर दीं, जिससे क्षेत्र की डेमोग्राफी बदलने की कोशिश हुई।
कोर्ट ने दो बातें साफ की
धर्म और ST दर्जे का नियम
कोर्ट ने कहा – SC के लिए धर्म का बंधन है। हिंदू, सिख या बौद्ध छोड़कर दूसरा धर्म अपनाने पर SC दर्जा खत्म हो जाता है। लेकिन ST के लिए ऐसा नहीं है। ST दर्जा जन्म, कबीला और समुदाय से तय होता है, धर्म से नहीं। इसलिए ईसाई या मुस्लिम बनने के बाद भी ST की पहचान बनी रह सकती है। यही कारण है कि देश के कई राज्यों में धर्म बदलने के बाद भी आदिवासियों को आरक्षण मिल रहा है।
जमीन के अधिकार पर नियम
मा.कोर्ट ने कहा – सिर्फ ST सर्टिफिकेट होने से आप ST की जमीन नहीं खरीद सकते। यूपी के जमीन कानून के मुताबिक, ST की जमीन सिर्फ ST ही खरीद सकता है, और वो भी तभी जब वह अपनी जनजातीय परंपरा, रीति-रिवाज, भाषा और समुदाय से जुड़ा हो। इस केस में याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाई कि दशकों तक मुस्लिम रीति से जीवन जीने के बाद भी वह पनिका समाज की परंपराओं से जुड़ी रहीं और समाज ने उन्हें स्वीकार किया है। इसलिए प्रशासन की कार्रवाई को कोर्ट ने सही ठहराया।
फैसले के बाद प्रशासन ने उस जमीन पर खेल मैदान, विवाह मंडप और भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा लगाने की तैयारी शुरू कर दी है।

